Thursday, April 4, 2013

कर्मचारियों के प्रति प्रबन्‍धन-वर्ग का दायित्‍व



कंपनी प्रबंधन-कर्मचारियों में सहयोग आवश्‍यक है


आज दुनियाभर में फैले 80 प्रतिशत व्यापार का संचालन निजी कम्पनियों द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए कम्पनियां अपने यहां एक मजबूत प्रबंधन-तंत्र बनाती हैं। इसका मुख्य कार्य कम्पनी की आर्थिक, व्यावसायिक, व्यापारिक, कानूनी कार्यप्रणालियों और गतिविधियों पर बराबर नजर रखना होता है। आए दिन कम्पनियों को अपने और दुनिया के अन्य देशों की सरकारी नीतियों की अहम जानकारियां एकत्र करनी पड़ती हैं। इनमें भी अपने और संबंधित देश के कम्पनी मामलों के मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी की गई रिपोर्टों से अवगत होना बहुत जरुरी होता है, ताकि कम्पनी और कर्मचारियों के उज्ज्वल भविष्य के महत्वपूर्ण निर्णय समय पर लिए जा सकें। बकायदा इसके लिए कम्पनी अधिनियम, 1956 के अधीन कम्पनियों को सरकारी नीतियों पर चलने के लिए भी निर्देश दिए जाते हैं।

 किसी देश में सरकारी प्रतिष्ठानों, निजी और अर्द्ध-सरकारी कम्पनियों का संचालन इतना कुशल तो होना ही चाहिए कि अपना फायदा देखने से पहले वे आम आदमी की सामाजिक जरुरत का भी ध्यान रखें। इसी उद्देश्‍य को ध्‍यान में रख कर उन्हें सरकारी नियमों के अधीन रह कर अपना व्यापार संचालित करना होता है।

 आज इस सदी में, जहां पैरों के जूते-चप्पल से लेकर सिर के बालों तक के लिए असंख्य उत्पाद तमाम मशीनों से बन कर हम तक पहुंच रहे हैं, मानव जीवन बाह्य रुप से बहुत आसान नजर आता है। लेकिन इस आसान जीवन और सुविधा के एवज में आत्म-संतुष्टि और सुख-चैन कहीं खो गया है। इस का एकमात्र कारण कम्पनी प्रबंधन का अपने कर्मचारियों के प्रति पनपता उदासीन रवैया है। यह रवैया दिनोंदिन विकराल रुप धारण करता जा रहा है। कम्पनियां उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान देने की बजाय उपभोक्ता अधिकारों के हनन की कीमत पर लाभ लालसा में पड़ी हुई हैं। उत्पाद गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए उन्हें सुयोग्य कर्मचारियों की जरुरत नहीं है। वे तो बेहद कम वेतन पर सिर्फ बेशुमार उत्पादन (क्वालिटी घटाकर) के उद्देश्‍य से कर्मचारियों की नियुक्ति कर रही हैं। कम्पनियों में व्यक्ति विशेष की योग्यताओं और अतिरिक्त क्षमताओं का आकलन करने की किसी सुनियोजित प्रणाली का अभाव हमेशा से विद्यमान है। वे अपने पुराने ढर्रे से बंधी हुई हैं। इस कारणवश काम बहुत ही नीरस और अनमन्य ढंग से पूरे होते हैं। परिणामस्वरुप योग्य कर्मचारी-वर्ग भी रुटीन कार्यों से बुरी तरह ऊब जाते हैं और भेड़चाल में शामिल हो जाते हैं। देखा जाए तो इन सब के कारण कम्पनी से ज्यादा नुकसान खुद कर्मचारियों को ही झेलना पड़ता है। क्योंकि वे कम्पनी का कर्मचारी होने के साथ-साथ वहां पर निर्मित होनेवाले उत्पाद का एक उपभोक्ता भी होते हैं। कम्पनी में उनके अधिकारों का हनन तो होता ही है, उपभोक्ता बनकर भी उन्हें ज्यादा रुपए देकर कम गुणवत्तावाले उत्पाद लेने को विवश होना पड़ता है।

 आज के दौर में अधिकांश कंपनियां, निर्माण इकाईयां, औद्योगिक घराने अपने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से अपने प्रबंधन तंत्र को ठीक ढंग से नहीं चला पा रहे हैं। उन्हें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। क्योंकि इस महत्वपूर्ण विषय की सतत् अनदेखी से भविष्य में लेने के देने पड़ सकते हैं। अतः प्रबंधन तंत्र को समय रहते जाग जाना चाहिए। कम्पनी-कर्मचारी के स्वस्थ संबंध को बनाए रख कर कम्पनियां अपना, कर्मचारी-वर्ग, देश और समाज का भला तभी कर सकती हैं जब इस संबंध में बनाई गई नीतियों को रचनात्मक तरीके से व्यवहार में लाया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक कम्पनी के प्रबंधन वर्ग को कई कंपनी विषयों और उनके क्षेत्रों के बारे में अपने खुद के दृष्टिकोण को परिष्कृत करना होगा। उनका सबसे अहम दायित्व अपने कर्मचारियों के कार्य का उचित मूल्यांकन करके उनका उत्साहवर्धन करना होना चाहिए। कम्पनी को खुद के साथ-साथ कर्मचारियों के भविष्य की चिंता भी होनी चाहिए।

 यदि कम्पनियों को देश और दुनिया के साथ आगे बढ़ना है तो उन्हें अपने कर्मचारियों के चहुंमुखी विकास के लिए एक विस्तृत कार्य-योजना बनानी होगी। और इसी के अनुरुप उन्हें अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को चलाना होगा।

10 comments:

  1. सार्थक पोस्ट , आजकल तो कई सारी निजी कम्पनियां ऐसा कर भी रही है ......

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  2. आज ट्रेड यूनियन राजनीति गुट बाजी में अपनी छबि खो बैठी है
    कर्मचारी भयभीत है,ऐसे माहौल में अपने हक़ की बात करना
    अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना है

    आपने सार्थक सच को इंगित किया है
    इन्कलाब जिन्दाबाद
    आपको आलेख की बधाई

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  3. सार्थक और सुन्दर पोस्ट ...

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  4. विकेश जी , मुद्दा नि:संदेह आपने बढ़िया उठाया है, लेकिन कहना चाहूँगा कि मैं इस मुद्दे पर बहुत करीब से जुडा हूँ इसलिए जानता हूँ कि माहौल सिर्फ कंपनी पर्बंधन नहीं बनाता बल्कि देश की आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितिया तय करती है। माहौल सरकार को बनाना होता है, जो दुर्भाग्य्बश इस देश में नहीं है।

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  5. मजदूर की आज केवल परिभाषा ही बदली है पर हालात तो वही है ..

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  6. विकेश जी आपका पोस्ट सार्थक है जैसे मोनिका जी ने लिखा है वेसे मैं भी लिख रहा हूं। सारी निजी कंपनियों में ऐसा हो रहा है,इसमें कोई दो राय नहीं। निजी कंपनियों को उनके बाजार में मूल्य बने रहने की हमेशा चिंता रहती है; अतः दर्जे के बारे में कोई समझौता नहीं होता और कुशल कर्मचारी का हीत तथा सुरक्षा की बात सोची जाती ही है। हां यह वाक्य सरकारी कर्मचारी और कंपनियों को लागु नहीं होती कारण वहां राजनीतिक हस्तक्षेप रहता है। कर्मचारियों की कुशलता और काबिलियत भी नहीं देखी जाती, काबिलियत होती है आप राजनेताओं को कितना झेलते और चाटते हो। ऐसे जगहों पर न कंपनी का भला होता है और न कर्मचारियों का।
    डॉ.विजय शिंदे drvtshinde.blogspot.com

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  7. शोषण शोषण नै और पुरानी अर्थ नीतियाँ श्रमिक का कुछ नहीं सोचती काल सेंटर श्रम क़ानून के दायरे के बाहर बने हुए हैं १ ० से बारह घंटे की पाली (शिफ्ट )बे -हूदा बात है .

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  8. बहुत उपयोगी और सामयिक चिन्तन

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  9. जैसा कि मोनिका जी और विजय जी ने कहा है, प्राइवेट कम्पनियाँ बदलते तकनिकी के साथ अपने कदम बनाये रखने के लिए अपने एम्प्लोयीस को ट्रेन करती रहतीं हैं, अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनका अपना ही नुक्सान है। ट्रेनिंग में जिन्हें भेज जाता है उनका चुनाव बहुत सोच समझ कर किया जाता है, क्योंकि कंपनी का पैसा लगता है, जिसे ट्रेनिंग मिलती है उससे उम्मीद भी होती है कि वह सचमुच कुछ सीख कर आये ताकि कम्पनी ने जितना ट्रेनिंग में खर्च किया है उससे कई गुना ज्यादा फायदा हो।
    सरकारी तंत्र में कोई माई-बाप तो होता नहीं है इसलिए उनकी बला से कोई सीखे की न सीखे। अगर ट्रेनिंग विदेश में हो रही है तो ऐसी ट्रेनिंग में सिर्फ बड़े अधिकारी ही जाते हैं, मकसद होता है विदेश यात्रा डींग हांकने को भी मिल जाता है कि फोरें रिटर्न हो गए और टी ए , डी ए भी बन जाता है। तफरी की तफरी, पैसा बना सो अलग। और गाल करने का एक मौका भी मिल जाता है। सीखना उन्हें कुछ होता नहीं है, इसलिए सीखते भी नहीं हैं।

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