Friday, April 12, 2013

एफडीआई और महंगाई



वालमार्ट का खेल, एफडीआई झेल


यूपीए ने पूंजी लाभ कमाने में दलाली की सीमा पार कर दी है। नौ साल पहले जब ये केन्द्र की सत्ता में आयी तो इसके पास एनडीए की सन्तुलित और बेहतर अर्थनीतियों को विस्तार दे कर देश को लाभान्वित करने का अच्छा अवसर था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लोगों के बेहतर जीवन के लिए आर्थिक गतिविधियों के समुचित बने रहने देना भी इसे रास नहीं आया। यदि यूपीए सत्ता में आकर एनडीए की अर्थ समावेशी नीतियों को आगे बढ़ाता तो यकीनन भारत की विकास दर दुनिया के लिए एक आदर्श होती! लेकिन नहीं, विरोधी पार्टी के रूप में भाजपा और सहयोगियों दलों की जनकल्याणोन्मुखी अर्थनीति से भी कांग्रेस को परहेज था। यह जानते हुए भी कि सत्ता में आकर कोई भी पार्टी यही काम तो देश के लिए करना चाहेगी, उसने मंदी में फंसे यूरोपीय देशों के आर्थिक मॉडल और विश्व व्यापार संगठन की मनमानी को चुपचाप अपना लिया। परिणामस्वरूप विगत आठ वर्षों में एक धनी वर्ग के विलासी जीवन का सपना सच करने के लिए देश के अधिसंख्य जीवन के रहन-सहन को अत्यधिक खर्चीला बना दिया गया है।
     ज्यादा पैसे कमानेवाले वर्ग और आम आदमी की क्रयशक्ति में सरकार को कोई अन्तर नजर नहीं आ रहा है। सब्सिडी के नाम पर किसानों, गरीबों, वंचितों को मुहैया सिलेंडर, डीजल, राशन वितरण की कांग्रेस सरकार की सेवाएं कभी भी दलाली से मुक्त नहीं हो पायीं। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करनेवालों को प्रदान की जा रही तरह-तरह की सेवाओं की सब्सिडी अनिश्चित समय तक बनी रह सकती थी। लेकिन अल्पसंख्यक और साम्प्रदायिक इन दो शब्दों के जाल में इस देश में विगत एक दशक में जिस बड़ी जनसंख्या का आयात हुआ है, उसने इस देश के गरीबों का हक भी मार दिया। सत्ता में बने रहने के खेल में चाहे-अनचाहे भारत में घुसे ऐसे लोगों को पहचान कर बाहर खदेड़ने के बजाय उलटे उन्हें वोट बैंकिंग का अहम कारक बना दिया गया है। कह सकते हैं कि उनकी देश के उपभोज्य संसाधनों में बढ़ती हिस्सेदारी से ही सरकार ने वस्तुओं के मूल्यों में अतिशय वृद्धि की है। मतलब मनरेगा जैसी योजनाओं की जरूरत इसलिए नहीं पड़ी कि इससे भारतीय गरीबों का भला होता, इसकी आवश्यकता के पीछे की साजिश में वह मत-लालच ही था, जिसके दम पर मौजूदा सरकार अपने कार्यकाल को निरन्तर बढ़ाना चाहती है और देश को भ्रमित करके मनमाने तरीके से पूंजी पोषण करते रहना चाहती है। 
          आज यदि कालेधन के लिए कोई विधेयक अभी तक नहीं बन पाया है तो इसके लिए संसद में मानसून या किसी सत्र में कामकाज नहीं होने का बहाना नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए खुद सत्तासीन जिम्मेदार हैं। पिछले लगभग एक दशक से सरकार के समानांतर एक और सरकार चल रही है। इसने वैध रूप से धन निवेश करने के बजाय माल, मल्टिप्लेक्सेस, कुकरमुत्तों की तरह फैले निजी कॉलेजों को खोलने का जो अभियान चलाया, उसका उद्देश्‍य कालेधन को ठिकाना लगाना ही था। विडंबना ही है कि देश में सरकारी स्तर पर कॉलेजों, अस्पतालों, विद्यालयों की उस संख्या में स्थापना नहीं की गई जितनी कि आम आदमी की जरूरत के विपरीत बिग बाजारों, माल और निजी कॉलेजों को खोल दिया गया।
     फिल्मों के कारोबार में भी अवैध पूंजी का बहुत ज्यादा निवेश होता रहा है। इसी के चलते कई फिल्मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की हत्या कर दी गई। लेकिन इस पर कोई समिति गठित करने या इसकी छानबीन करने की कोशिश भारत सरकार ने उस तरह से नहीं की, जिस तरह से धार्मिकता साम्प्रदायिकता के नाम पर वह अदालत के साथ मिलकर चाक-चैबन्द हो कर हिन्दू विरोधी दर्शनों का विरोध करती रही है।
    सरकारी मंशा तो यही लगती है कि अकूत कालेधन को ठिकाने लगाने के लिए माल, आईपीएल, बिग बाजार, अयोग्य छात्रों की संख्या बढ़ाते निजी कॉलेजों इत्यादि जैसे धननिवेश मार्गों से वह पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पा रही है। इसलिए अब उसने कालेधन को एक बार में ही श्वेत करने का निर्णय एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में किया है। उसे इस बात की चिंता कतई नहीं है कि जनादेश इसकी अनुमति देगा या नहीं। उसने तो अपनी दलाली मजबूत करने के क्रम में एक कदम और बढ़ाया है। इससे जिसको नुकसान होगा वह है इस देश की आम जनता, जिसके बारे में किसी भी विदेशी नीति पर निर्णय करते समय कभी भी सोचा ही नहीं जाता है। संवैधानिक लोकतान्त्रिक प्रणाली की धज्जियां कैसे उड़ती हैं इसकी बानगी तो विपक्ष के साथ सरकार के सहयोगी दलों द्वारा महंगाई और एफडीआई के विरूद्ध आहूत भारत बन्द के जवाब के तौर पर सरकार द्वारा एफडीआई लागू करने की अधिसूचना जारी करते ही पेश हो गई थी। उसे इसका बिलकुल भी आभास नहीं था कि त्रृणमूल कांग्रेस के सांसदों के इस्तीफे देने के बाद आधिकारिक तौर पर सरकार अल्पमत में थी और वह सरकार में सम्मिलित घटक दलों के साथ ज्वलंत एफडीआई मुद्दे पर आम सहमति बनाए बगैर इसकी अधिसूचना कैसे जारी कर सकती थी! इस देश की जनता पूछ रही है कि यह नाटक क्यों खेला जा रहा है? क्या लोकतन्त्र ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गया है?


13 comments:

  1. तकलीफ होती है देश की ऐसी हालत देखकर .
    ये राजनेता कोई सीख भी नहीं लेते इतिहास से, न ही अपने आसपास से.
    चिंतनीय विषय पर एक अच्छा लेख.

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  2. विकेश जी, क्षमा चाहता हूँ अत्यधिक व्यस्तता और टूर की वजह से ब्लॉग जगत पर अधिक समय दे पाने में असमर्थ हूँ। आपने अपने आलेख में एकदम सही बात कही है, मैं भी आपकी बात का समर्थन करता हूँ। एक बात और आपने लगता है शायद मेरी एक पिछली टिपण्णी किन्ही कारणों से डिलीट कर दी थी। खैर, यहाँ भी यह इंगित करना चाहूँगा कि आपके इस आलेख के बिन्दुओं से लगता है कि यह आलेख आप दोबारा पोस्ट कर रहे है। क्योंकि यूपीए को अब दस साल होने जा रहे है आपने आलेख के शुरुआत में लिखा है सात साल, साथ ही आप मानसून सत्र की बात कर रहे है। इसीलिये मैं यह अनुमान लगा रहा हूँ कि शायद आपने यह लेख पहले लिखा हो।

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  3. जी यह आलेख मैंने कुछ महीनों पूर्व लिखा था। आपकी टिप्‍पणी डिलीट नहीं की मैंने आपकी टिप्‍पणीवाली पोस्‍ट को दोबारा डाला है। टिप्‍पणी मेरे पास सुरक्षित है। धन्‍यवाद आपके संज्ञान का और ब्‍लॉग विजिट का।

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  4. गोदियाल जी नमस्‍कार। यह आलेख दोबारा नहीं प्रथम बार ही पोस्‍ट कर रहा हूँ हां लिखा कुछ महीनों पूर्व था।

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  5. आज सरकार विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अकर्मण्यता या गलत निर्णयों के कारण अलोकप्रिय होती जा रही है...निश्चय ही उसकी कार्यप्रणाली के कारण यह शोचनीय स्तिथि है..बहुत ही सार्थक आलेख...

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज के ब्लॉग बुलेटिन पर | सूचनार्थ |

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  7. एक सार्थक और वर्तमान का वास्तविक मूल्यांकन करनेवाला लेख। सरकारें हमारे देशी व्यवस्था को तोडने पर उतारू है। यह देश भविष्य में कौनसे दिन देखेगा, कभी-कभार सरकार की अर्थनीतियों को देख डर लगता है। पूंजिपतियों के हाथ में सारे उद्योग गए तो देशी जनाता क्या करें - गुलामी। गांधी जी ने देशी उद्योग और गांवों की स्वयंपूर्णता की हिमायत की थी। अब क्या हो रहा है, गांधी तो कांग्रेसी थे। वर्तमान कांग्रेस गांधी का उत्तराधिकारी अपने-आप को मानती है, तो उनके द्वारा बताई गई बातों की वाट क्यों लगा रही है। लगता है यह सरकार कांग्रेस प्रणित नहीं अंग्रेसी(जी)प्रणित हो गई है।

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  8. जब व्यक्ति और देश के विकास के मानक भिन्न हों तो यही हाल होगा।

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  9. सरकार की अर्थहीन नीतियों का खुलासा करता बेहतरीन आलेख,आभार.

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  10. लोक तंत्र और भारत में ?हा ! हा! हा !यहाँ तो चर्चिया एजेंटी का रिमोट तंत्र है सिरों की गिनती है ,सेकुलर शब्द का अतिशय दोहन ,शोषण और पोषण है .सेकुलर बोले तो सनातन भारत धर्मी समाज विरोधी प्रबंध .एक वो पठ्ठा (उल्लू लगाए बिना भी आप अर्थ से बा वास्ता हैं )आज भी सेकुलर और साम्प्रदायिक कम्पार्टमेंट की मुंह में बीड़ा दबाए बात करता है .सबके सब वक्र मुखी हैं ये .

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  11. जनादेश की सहमति का जहमत कौन सरकार उठाती है ..बस वह तो बोझ लादना जानती है . अब महंगाई जो नाच दिखाए..

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  12. ज्वलंत मुद्दा .... आंतरिक हालात इससे भी ज्यादा खौफनाक है .....बढ़िया पीस...

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  13. अर्थ व्यवस्था का सही आंकलन करती है आपकी पोस्ट ... ये दुर्भाग्य है देश का की नेता लोग जिनको नेतृत्व करना है देश का भ्रष्ट हो गए हैं ..

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