Wednesday, April 10, 2013

नाम बड़े दर्शन छोटे



दो नावों की सवारी, भारत पर भारी


कुछ अनुभव पीछा नहीं छोड़ते। विशेषकर जब ये देश, संस्कृति, सभ्यता और भाषा से जुड़े हों तो मन-मस्तिष्क पर सदैव हावी रहते हैं। प्रायः हम अपने बच्चों का नामकरण विशुद्ध हिन्दी या संस्कृतनिष्ठ शब्दों में करते हैं। उनके जन्म सम्बन्धी और अन्य आयोजनों का निर्वाह हिंदू कर्मकांड प्रथा के साथ सम्पन्न करते हैं। अपने और अपने परिवार की कुशलक्षेम के लिए दैनंदिन के पूजाकर्म करते हैं। ईश्वर के प्रति आस्थावान रहते हैं एवं प्रयत्न करते हैं कि बच्चे भी इस संस्कृति का अनुसरण करते हुए अपना जीवन संचालित करें। लेकिन विडंबना देखिए कि आम जीवन में हम इन हिन्दू संस्कारों के विपरीत आचरण करते हैं। बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान कर रहे विद्यालयों में पढ़ाते हैं। सुबह से सायं तक उनके साथ अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करते हैं। बच्चों से उनका नाम पूछने पर सुनने में आता है......आरव, काव्य, निधित्व, शिवांगी, अनुष्का, ऐश्वर्य आदि। माता-पिता का नाम पूछने पर उत्तर में एस. शर्मा, एल.एन. मिश्रा, वी. सी. विज सुनाई देता है। विद्यालय की जानकारी मांगो तो मांटेसरी, समरविले, डी.ए.वी., सेंटर स्कूल और कक्षा के बारे में पूछा जाता है तो नर्सरी, के.जी. फर्स्‍ट व सेकेंड सुनते रहो। कहने का तात्पर्य है कि नाम को छोड़ कर बाकी सब कुछ जैसे भोजन, वस्त्र, मनोरंजन, घर, परिवार सब अंग्रेजियत के पराभूत है। देश के संचालनकर्ता, शिक्षा प्रशासक और घर-परिवारी ये कौन सी जीवन-यात्रा कर रहे हैं, जिसमें दो नावों पर पैर रख कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति पनप रही है? ऐसे चलते रहने से न तो अपना धर्म, संस्कार, संस्कृति, भाषा फलीभूत होगी और ना ही पाश्चात्य अपसंस्कृतियां हमारा भला कर सकेंगी। यह तो अन्धेरी गुफा में अलक्षित मार्ग पर आंख मूंद कर चलने की आत्मघाती प्रवृत्ति है, जिससे अंततोगत्वा विनाश के व्यूह की ही रचना होगी। जब हमारे मन में अपने बच्चों के विशुद्ध हिन्दी नाम रखने की इच्छा है तो हम उन्हें हिन्द भूमि की शिक्षा, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता क्यों नहीं सिखाते हैं? क्यों उन्हें उनके नामों जैसा नहीं बनाते हैं? हमारी शिक्षा और सभ्यता में जीवन का समस्त सुन्दर आभास है, मानवता की सच्ची लगन है, सज्जनता की गहराई है। और जहां ये सब मानवोचित श्रेष्ठ गुण हों वहां की भाषा, शैक्षिक वातावरण को नहीं अपना कर हम अपने और बच्‍चों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं। कह सकते हैं कि भारत देश के सन्दर्भ में आज नाम बड़े दर्शन छोटे’’ की कहावत एकदम सटीक है।

14 comments:

  1. बात तो आपने खरी लिखी है लेकिन यह अब उतना आसान भी नहीं है क्यूंकि अँग्रेजी हमारे समाज में ही नहीं वरन हमारे व्यक्तित्व में भी इस तरह घुल मिल गयी है कि अब उसके बिना जीवन का गुज़ारा नहीं है। फिर किसी एक के करने से क्या होता है कुछ हद तक तो सरकार भी जिम्मेदार है क्यूंकि सरकारी विद्यालयों कि स्थिति किसी से छिपी नहीं है और दूसरी बात प्रतियोगिता का ज़माना है तो अँग्रेजी आना सांस लेने जैसा ज़रूरी होगया है।

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  2. असल बात ये है भाई के ज़बान कोई भी बुरी नहीं होती बुरी बात ये है के अपनी मादरे ज़बान को भुला कर किसी और की मादरे ज़बान को अपना लेना और उसी का प्रचार करने लग जाना कहाँ तक उचित है | जबकि सबको पता है के दुनिया में हर ज़बान की माँ देवनागरी लिपि और संस्कृत है | इन दोनों से बड़ी ज़बान कोई नहीं दुनिया में | फिर भी लोग अंधे, गूंगे, बहरे और बावले हुए रहते हैं अपनी संस्कृति को छोड़ दूसरों की गंदगी अपनाने को | धिक्कार है उनपर |

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  3. न संस्कृति किसी देश की बुरी है न ही भाषा बुरी है न ही उसे अपनाने में बुराई है। जहाँ तक अङ्ग्रेइजि का प्रश्न है यह ग्लोबल भाषा है, और दुनिया बन रही है ग्लोबल विलेज । आज प्रतिस्पर्धा का युग है, खुद को सेलेबल बनाने के लिए अंग्रेजी जानना न सिर्फ आवश्यक है यह अनिवार्य भी है। हम भारतीय नक़ल करने में ज्यादा माहिर हैं, वो भी भोंडी नक़ल। होलीवूद की फिल्में, हर फिल्म की तरह सस्कृति का एग्जरिरेशन हैं। जो उसमें दिखाया जाता है, दरअसल हु-बी-हु वैसा कुछ नहीं है। पश्चिम में भी परिवार होते हैं वहां भी अनुशासन होता है, वहां भी रिश्ते निभाये जाते हैं। लेकिन जहाँ तक संस्कृति को अपनाने प्रश्न है, हम पाश्चात्य संस्कृति इसलिए अपना लेते हैं क्योंकि वो कम्फर्टेबल है। पश्चिम में खान-पान, कपडे-लत्ते, मौसम और सुविधा के अनुसार अपनाए जाते हैं। सुविधा उनकी संस्कृति है, और हम भी अब सुविधा को ही ज्यादा महत्त्व देने लगे हैं, फिर हमें ऐसी बात की नक़ल करने के लिए पश्चिमी खान-पान और रहन-सहन ही नज़र आता है। दूसरी बात जो ज्यादा कूल और ज्यादा डिमांड में होता है हम उसे ही अपनाते हैं, आज पश्चिमी संस्कृति ज्यादा कूल और डिमांड में हैं हम उसे अपना रहे हैं। हमलोग साउदी अरब की संस्कृति या अफ्रीका की संस्कृति नहीं अपनाते क्योंकि वो न तो सुविधाजनक है न ही कूल। जिस दिन वो इस कटेगरी में आ जायेंगे हम उनको अपना लेंगे।

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  4. अङ्ग्रेइजि=अंग्रेजी

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  5. मेरा कमेन्ट स्पैम में चला गया है विकेश, देख लेना।

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  6. दो विपरीत ध्रुवों को मिलाने के प्रयास में यही होना है,भविष्य में परिणाम बहुत अच्छी नहीं होने वाले.
    मैकाले की कूटनीति संफल रही.

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  7. आज के सन्दर्भ में जीवन के सभी मायने झूठे हैं
    हर आदमी अपना जीवन जीना चाहता है,
    न वह संस्कृति,सभ्यता,संस्कार को समझ प् रहा है और
    न ही अपना मौलिक कर्तव्य
    आदमी तो बस अपने राग में जीना चाह रहा है
    आपने बहुत सार्थक और एक नयी बात उठाई है
    विचारणीय आलेख
    बधाई

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  8. दुविधा को बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है, संस्कृति को न तज पा रहे हैं और न ही अपना पा रहे है, आधुनिक त्रिशंकु।

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  9. ज्योति खरे जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ ..

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  10. विकेश जी हम अपनी भाषा से बिल्कुल प्रेम करते हैं। नाम बडे दर्शन छोटे जैसी भारत की स्थिति है नहीं, मैं आपकी बात को नकार रहा हूं, नाराज मत हो। आप भी स्वीकारेंगे कि भारत पर अंग्रेजों ने जो डेढ सौ साल राज किया उसका नतिजा हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा है। आधुनिक पढाई के लिए हमारे देश के किसी भी भाषा में पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए लोग अपने बच्चों की पढाई अंग्रेजी में करवाने के लिए मजबूर है। हिंदी या अन्य देशी भाषाएं सांस्कृतिक ज्ञान देने के लिए सक्षम है पर तकनीकि ज्ञान देने में अंग्रेजी की तुलना में कमजोर। भाषा अभिमान एक जगह पर ठीक है पर कोई माता पिता अपने बच्चे का भविष्य उस अभिमान के लिए दांव पर लगाना पसंद नहीं करता, यह वास्तव है। अगर कोई हठ पर उतर कर बच्चों को परंपरागत मार्गों से लेना चाहे तो उनके सफल होने का प्रमाण बहुत कम है। ऐसे नाकाम हो चुके बच्चे भविष्य में माता-पिता को माफ भी नहीं करेंगे।
    दूसरी बात हिंदी का भविष्य धीरे-धीरे बदल रहा है वह भी आधुनिक तकनीकि पढाई करने में सक्षम बनेगी पर उसे समय लगेगा।

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  11. हम तीसरी दुनिया के ही नहीं तीसरी प्रजाति के लोग बनते जा रहे है अपनी ही करतूतों से .

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  12. समय के साथ तो सब कुछ बदलता ही जाता है फिर भी हमे अपनी संस्कृति,और संस्कार को नही भूलना चाहिए...आपको नवसंवत्सर की हार्दिक मंगलकामनाएँ!

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  13. बहुत अच्छा लिखा है आपने विकेश जी. पिछले साल दिल्ली आने का मौका लगा था और जिस कदर दिल्ली को बदला देखा मैंने... बदलती भाषा और ढंग को देखा तो मुझे कोई शक नहीं रह गया जैसा मेरे दोस्त बताते थे अपने बदलते देश के बारे में. जिस बात से सबसे ज्यादा दुःख होता है मुझे वो ये कि जिन्हें अंग्रेजी बोलना नहीं आता है उन्हें हीन समझा जाता है. हिंदी से जुड़े पेशे भी कम वेतन वाले हैं अंग्रेजी की तुलना में. जिस तरह से हम पश्चिम की नक़ल करते जा रहे हैं उसका परिणाम कुछ अच्छा होने की उम्मीद नहीं है. शायद उसके दुष्प्रभाव अपने देश में १०-१५ सालों में बहुत अच्छी तरह दिखने लगे. पश्चिम की जिन बातों को हमें अपनाना चाहिए वो हमलोग देख नहीं पाते हैं. पर अपने अनुभव से ये जरूर कहूँगा कि अपना सामजिक और पारिवारिक जीवन बहुत अच्छा है. देर सवेर शायद हम सब में जागृति हो.

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  14. यही विरोधाभास आज की विडम्बना है..शिक्षा की भी और जीवन की भी.

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