Friday, March 8, 2013

होली दिवस का जीवन-अनुभव

होली के रंगों से रंगीन आज के दिन को वर्ष का सबसे मनभावन दिन कह सकता हूँ। धरती पर सूर्य की किरणें जैस ही व्‍याप्‍त हुईं, पर्यावरण को देखने और महसूस करनेवालों ने यह समय जीवनभर के लिए एकत्रित कर लिया होगा। निर्मल जलवायु। न अधिक ठंड न गर्मी। क्‍या सुखद ताप स्‍तर लेकर दिन व्‍यतीत हुआ। रंगों से सम्‍पूर्ण वसुन्‍धरा का भारतीय भूभाग आज कितना आकर्षक बना हुआ था। धूप की पीली कनात सब जगह बिछ गई थी। हवा का मधुर स्‍पंदन कण-कण और क्षण-क्षण में पसर गया था। अब तक धरती पर अपने बोझिल होने की जो भावना थी और यह भावना जीवन संतुष्टि के लिए जिस स्‍वर्ग को ढूंढ रही थी, वह आज मिल गया था।
      बुआ के घर पर बैठ कर होली-रंगायन देखा। अपने ह्रदय के सबसे कोमल अहसास में आपकी याद समायी हुई थी। निरन्‍तर सोच रहा था कि आपकी स्‍वर्गिक उपस्थिति से पृथ्‍वी का कौन सा भाग होली के आनन्‍द के साथ और अधिक आनन्‍दमय हो रहा होगा!
      दोपहर तक मौसम ने अपना प्रभाव कितना अधिक फैला दिया था। मन्‍द गति से चलती पवन में वृक्षों के पत्‍ते, जिनके पीले रंग ध्‍यानस्‍थ करते थे, यहां-वहां गिर रहे थे। वृक्ष की एक शाखा के हिलने से दूसरी शाखा पर पड़ती, हिलती उसकी परछाई इस रंगानुभव में कितनी दिव्‍य लगती थी। नीला नभ कितना विस्‍तृत था। असीमित ऊंचाई पर पक्षियों का उड़ना देख कर मन की गांठें खुल गईं। यदि ऐसा दिन जीवन के बराबर लम्‍बा होता तो कितना अच्‍छा जीवन जिया जा सकता है। लेकिन मन के भावों के उतार-चढ़ाव की तरह मौसम भी बदलता रहता है। या क्‍या पता मौसम के बदलने से मन के भावों में बदलाव होता हो!
      दिनभर होली के रंग उड़ते, लगते, अनुभव होते रहे। कभी आकाश तो कभी पेड़-पौधों, पक्षियों, मनुष्‍यों के व्‍यवहार में रंगीन त्‍यौहार का उल्‍लास नजर आता। पूरे दिन इन अनुभवों से दिल किसी प्रेम लगन में स्थिर रहा। दिल न रोता न हंसता। वह तो जैसे निष्‍कपट स्‍नेह के ज्‍वर से आश्चर्यभूत हो भोलाभाला बना हुआ था। एक-दूसरे पर रंग डालते, पानी उड़ेलते बच्‍चों का सामूहिक खिलंदड़, व्‍यंग्‍य, हंसी-ठट्टा और होली गीत गायन जब-तब मेरा ध्‍यान अस्थिर करता रहा। आज इन बच्‍चों पर मन क्रोधित नहीं हो रहा था, बल्कि मेरा मन भी बच्‍चों के बीच जाकर उन जैसे उछलने-कूदने को हो रहा था। रंग, पानी, हवा, मिट्टी, परस्‍पर प्रेम की एक नई गंध वातावरण में फैली हुई थी, जिससे सांसें उन्‍मुक्‍त हो गईं। मन-मस्तिष्‍क विचार और भाव से रिक्‍त हो गए। व्‍यक्तित्‍व हवा में लहराता अदृश्‍य प्रकृति कण बन गया।
      अब रात है। इस समय दिन के तरल-सरल स्‍नेहानुभव जैसे व्‍यवहार बनने को व्‍यग्र हैं। मेरा शरीर जैसे रंगहीन जल बन गया है। मैं जैसे जल तरंग हो गया हूँ। चहुं ओर शून्‍य आभाष। थोड़े अंतराल पर पुन: एकाग्र हुआ तो देखा पूर्णमासी की निशा अपने प्रभाव से अचेत कर रही है। चन्‍द्रमा पूर्व से निकला था। इस समय वह रात्रि के दूसरे प्रहर में मध्‍याकाश में सुशोभित है। इसकी चन्‍द्रमयी अमृताभा मारे जा रही है। सांसें लेने में कठिनता हो रही है। घर में जाने के लिए पद हां नहीं कहते। बुआ के घर से अपने कमरे में जाने के लिए ग‍ली से गुजरता हूँ। गली के किसी घर में कोई अन्‍धेरे कमरे में ट्रांजिस्‍टर पर प्रेम का मनमोहक गाना सुन रहा है। मैं उस कमरे की खिड़की के निकट से गुजर कर अभी-अभी अपने घर पर पहुंचा हूँ। कीट-पतंगों की विचित्र ध्वनि रात्रि की नीरवता में वृद्धि करती है। दूर किसी दूसरी गली में महिलाओं का एक दल बैठ कर भजन गा रहा है। मेरे रहने का स्‍थान चन्‍द्रमयी प्रकाश से सुथरा हुआ है। प्रत्‍येक वस्‍तु की परछाई इस प्रकाश में विशिष्‍ट प्रभाव से सजी हुई है। मैं दम घोंट कर कमरे में प्रवेश करता हूँ।
(..२००७, होली दिवस का संस्‍मरण)

7 comments:

  1. होली का बहुत मनभावन शब्द चित्र..आपके एक एक शब्द भावों का प्रभावी सम्प्रेषण करते हैं...आभार

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  2. आप ने रंग -बिरंगे दिन का सजीव चित्रण कर दिया है ,पढते -पढते सोच रही थी अभी होली आई नहीं फिर यह लेख ... आखिर में नीचे तारीख देखकर सब समझ आ गया.

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  3. होली का मनमोहक अनुभव ...

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  4. भावपूर्ण आलेख होता है कभी कभी ऐसा भी, शायद इसी का नाम ज़िंदगी है ....

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  5. होली आगमन का चित्र मन में स्पष्ट हो गया।

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