Wednesday, March 6, 2013

प्रतीक्षा आपकी…..



प्रतीक्षा आपकी...............
चैत्र माह की बसंत ॠतु जीवन में एक विशेष समय है, जिसका अनुभव लेना है तो संवेदना से परिपूर्ण होना होगा। पूर्णमासी में नभ के क्षितिज पर रात के प्रथम प्रहर में सम्‍पूर्ण चन्‍द्रमा निकल आया है। हवा मन्‍द गति से चलती हुई ज्‍यों ही शरीर को स्‍पर्श करती है तो चन्‍द्र रात्रि की यह घड़ी हृदयाभूत हो प्रेम में तल्‍लीन हो जाती है। स्‍वच्‍छ और दूर-सुदूर तक स्‍पष्‍ट दिखता वातावरण दिल्‍ली शहर में भ्रम लगता है। लेकिन आजकल इस माह के प्रथम सप्‍ताह में यह भ्रम वास्‍तविक बनकर आंखों के सम्‍मुख है तथा इससे मन में एक नई स्‍फूर्ति और आनन्‍द का संचार हो रहा है। ध्‍यानपूर्वक चन्‍द्रमा को देखता हूँ तो पृथ्‍वी सौन्‍दर्य आलोक बन व्‍याप्‍त होती लगती है। टि‍मटिम कर अपने विचित्र आभाष से लुभाते सितारे कितनी प्रसन्‍नता प्रदान कर रहे हैं। हृदय में इच्‍छा होती कि रात्रिभर इस रजनी छवि पर नयन लगाए रखूं, पर शारीरिक विवशता व्‍यवधान बनती है और मैं हृदय तोड़ घर के अन्‍दर सोने चला गया। दिनभर की थकान से शरीर तो शयन स्‍थल पर लुढ़क गया, परन्‍तु अंत:स्‍थल जैसे चन्‍द्राकर्षण से अभिभूत था और घर से बाहर के मौसम के लिए बालपन की तरह रुदन एवं विलाप कर रहा था। इसलिए मैं किराए के कक्ष से बाहर आ गया।
रात के तीसरे प्रहर में भरपूर उजले चांद की आभा से पृथ्‍वी विशेष सौन्‍दर्य से युक्‍त है। जैसे प्रकृति रचयिता ने दूध की वर्षा कर रखी हो, जैसे दूर्बा घास से लेकर पीपल के विशाल वृक्ष की हरीतिमा का श्‍वेत दुग्‍ध रंग से श्रृंगार किया गया है। घने वृक्षों की छाया और चन्‍द्र किरणों के सहयोग से वसुन्‍धरा लोक अमृत छिड़क रहा है। परमशांति की ऐसी अनुभूति कहां होगी। चन्‍द्रमा को निरन्‍तर देखने का साहस नहीं हो पाया। लगता है कि लगातार देखने से अपनी अत्‍यन्‍त सुन्‍दर छवि से यह मुझे अचेत कर देगा। इसलिए कुछ समय तक इसकी सुन्‍दरिमा को देखा और पुन: अपने रहने के स्‍थान में आ गया। आपकी स्‍मृति में अपनी उदासी मैं किसके साथ सहभाग करुं! मुझे सब प्राण चेतनाहीन लगते हैं। अन्‍धेरी सीढ़ियों से होकर अपने कक्ष की ओर घोर उदासी में बढ़ते मेरे पग कितने लाचार हैं! यह विचार स्‍वयं के लिए एक मौन हमदम बनाता है। मैं इस मौन साथी से अपने प्रेमपूर्ण मन की दशा कहता हूं तो इसकी आंखों से अश्रुधार बहने लगती है। यह देखकर मुझे अपने लिए अंशमात्र की शांति मिलती है कि मैं अपने प्रेमी के लिए प्रेम में निष्‍कपट हूँ, सच्‍चा हूँ।
वृहद व्‍योम की बांहें इस रात्रि प्रहर में कितनी सुहावनी प्रतीत होती हैं। सितारों का रंग और आकर्षण अस्तित्‍व इतना सुन्‍दर है कि इनके लिए कोई भी परिभाषा तथा शाब्दिक व्‍याख्‍या हमेशा कम रहेगी। समय की अनंत गहराई में समाने के लिए सभी स्थितियां, प्राणी प्रायोजित हैं। तब भी अपने प्रेम-ध्‍यान में आपकी छवि अमिट लगती है। न जाने क्‍यूं यह लगता है कि आपसे जुड़ने का मेरा अनुभव सब पर विजय करके प्रेमोल्‍लसित हो हमेशा विद्यमान रहेगा। हमारे व्‍यावहारिक शरीरों की समाप्ति और समय की असीमितता में उनके गहरे दबने के उपरान्‍त भी उपस्थित रहेगा। मेरे पास प्रतीक्षा करने के अतिरिक्‍त दूसरा कोई उपाय नहीं है। प्रतीक्षा आपकी.....
(6 मार्च 2007 का संस्‍मरण)

13 comments:

  1. दिल्ली में और यह नज़ारा बहुत कम ही देखने को मिलता है :) और रही बात प्रतीक्षा की तो जीवन का दूसरा नाम ही प्रतीक्षा है....फिर चाहे हमारी हो या आपकी.

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  2. ये आस्मां में निकलने वाले चन्द्र की ही बात हो रही या उसके माध्यम से उस चंद की जिसको आपने घड़ा है अपनी कल्पनाओं के महीन तारों से ...
    जो भी होगी ... आपकी शब्द विन्यास में जरूर खो जाएगी ... सुन्दर कल्पना की उड़ान ...

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  3. बहुत ही सुन्दर संस्मरण,आभार.

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  4. ... तो करते रहिये प्रतीक्षा .. क्या हर्ज है ...

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  5. मर्मस्पर्शी संस्मरण

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  6. चाँद जब भीतर उतरता है तो वैसी ही स्निग्धता भर जाती है..

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  7. मंगलवार 26/03/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं .... !!
    आपके सुझावों का स्वागत है .... !!
    धन्यवाद .... !!

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  8. वाह, आपने तो उकसा दिया, आज ही छत पर जा कर निहारेंगे चाँद को।

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  9. शानदार और बहुत ही भावपूर्ण शब्दावली और विचारों से भरा ये संस्मरण | जिसकी प्रतीक्षा है वो ज़रूर मिले....आभार |

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  10. पंडिताई भाषा में लिखा यह लेख आपके अकेलेपन के दर्द को उकेरने की कोशिश कर रहा है लेकिन प्रकृति के दृश्य उकेरने के चक्कर में वह दर्द कहीं आप द्वारा दबा दिया गया। यह अन्याय किया गया। यदि उस दर्द को पूरी तरह बिखरकर आपने बह जाने दिया होता तो यह रचना अविस्मरणीय हो जाती।

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  11. प्रकृति वर्णन के साथसाथ अपने दिल के भाव का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया है आपने-बहुत बढ़िया latest post धर्म क्या है ?

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  12. धन्यवाद् आप लोगों का

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  13. बसंत का चाँद आँखों के सामने तैर गया और मन जैसे वहीँ चला गया
    बहुत सुन्दर

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