Monday, March 4, 2013

मौन….मेरा सच्‍चा मित्र

मेरे साथ ही होता है या सबके, ज्ञात नहीं पर आए दिन यह अनुभव मुझे विद्वान समझे जानेवाले लोगों के प्रति आशंकित एवं सशंकित करता है। मेरे संग-सम्‍मेलनवाले प्राण जिन्‍हें मैं प्रतिदिन मिलता हूँ, जिनसे प्राय: सामान्‍य और अन्‍तरंग बातें करता हूँ, जिनके साथ अपना दुख-सुख बांटता हूँ, उनमें से अधिकांश एक विचित्र रोग से ग्रसित हैं। उनके श्री मुख से जिस विषय को लेकर पूर्व में कोई बात निकली होती है, उसका वे अनेक बार ऐसा वर्णन करते हैं मानो प्रथम बार व्‍यक्‍त कर रहे हों। इतना ही नहीं वे सुननवाले से यह अपेक्षा भी रखते हैं कि वह बात सुनने के लिए गहरी तन्‍मयता प्रदर्शित करे। इस क्रम में ऐसा भी नहीं होता कि उनकी विषयक वार्तालाप नए प्रकार, शब्‍द और भाव से पुन: प्रकट होती हो। वार्तालाप अपने पूर्व के प्रकटीकरण जैसी ही होती है। मैं ऐसे में दुनिया बनानेवाले का ध्‍यान करने लगता हूँ। सोचता रहता हूँ कि कहां फंस गया ! किन सह‍कर्मियों से घिरा हूँ। ये दूसरे को एक शब्‍द बोलने का अवसर दिए बिना निरन्‍तर अपनी मनकही में मग्‍न रहते हैं। इनका साथ होने से तो एकान्‍त श्रेष्‍ठ है।
     प्राय: ऐसे लोग जिस विषय की भी चर्चा करते हैं और जितनी बार भी करते हैं उस दौरान सुननेवाले को वे कमतर ही आंकते हैं। सुननेवाला एक तरह से ऐसे बतंगड़ों की मूर्खता की अनदेखी करता है। वह समझदारी दिखाता है। पर बतंगड़ों की पड़ताल, जो वे अपनी निरर्थक वार्ता के दौरान जारी रखते हैं, में सुननेवाला एक निरा मूर्ख और बेवकूफ ही होता है। सुननेवाले को एक-एक समाचार, हरेक बात ऐसे बताई जाती है मानो वह किसी विषय का जानकार है ही नहीं।
मैं भी सुननेवाला हूँ। निरर्थक बतंगड़ों से घिरा हुआ हूँ। जैसे बातूनियों ने मेरे श्रवण संसाधनों अर्थात् कानों को हमेशा के लिए क्रय कर लिया है। जैसे मेरी जिह्वा को ऐसे बतकहों के सामने चुप्‍प रहने का अत्‍यन्‍त लम्‍बा दण्‍ड मिला हो। क्‍या कर सकता हूँ? सुन रहा हूँ। रो रहा हूँ। कहने के लिए अपनी कोई महत्‍वपूर्ण बात यदि है भी तो उसे सुनने योग्‍य कौन है? यह सोचकर मौन को अपना सच्‍चा मित्र बना लिया है। जो कहना होता है उसे शब्‍दों के रुप में लिखने का स्‍वभाव बना लिया है।
ऐसे द्रुतवार्ताकारों की निर्मूल वार्ताएं हमारे सत्‍ताधारियों से कितनी मिलती हैं। सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान के लोग भी जनता से बार-बार ऐसी ही निरर्थ बात करते हैं, और हर बार वे ये भी भूल जाते हैं कि यही बातें वे पूर्व में कई अवसरों पर कह चुके होते हैं। बातों से जनसाधारण को लुभाने का यह क्रम दशकों से चल रहा है। तब से निरन्‍तर हिन्‍दुस्‍थान अपनी हिन्‍दुत्‍व की पहचान का ह्रास करते हुए, मिली-जुली संस्‍कृति के नाम पर अपना सत्‍य समाप्‍त करने पर तुला हुआ है। इस समय कोई विदेशी प्रत्‍यक्ष रुप से भारत को नष्‍ट नहीं कर रहा बल्कि यहीं के कुछ सत्‍ताधारी लोग बर्बादी का नेतृत्‍व संभाले हुए हैं। विदेशी, पास-पड़ोसी इस तरह अपनी विध्‍वंशकारी इच्‍छा को पूर्ण होते हुए देखकर गदगद हैं। उन्‍हें भारत पर चढ़ाई का इससे सुगम पथ कहां से प्राप्‍त हो सकता था।
जनसाधारण से लेकर सत्‍ताधारियों का जब ऐसा व्‍यक्तित्‍व है तो राष्‍ट्र की स्थिति का मूल्‍यांकन सुगमता से किया जा सकता है। ऐसी अव्‍यावहारिक सोच एवं अनुत्‍पादक वार्ताओं से लोगों, जननायकों को मुक्ति प्राप्‍त करनी होगी। अन्‍यथा राष्‍ट्र को इसका मूल्‍य चुकाना होगा।

9 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतिकरण,सादर आभार।

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  2. लिखा तो आपने बहुत अच्छा है मगर मुझे कुछ ऐसा लगा जैसे विषय कुछ भटक सा गया हो सकता है यह मेरी समझ का फेर हो पर जो लगा वह बता दिया....

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  3. इस समय कोई विदेशी प्रत्‍यक्ष रुप से भारत को नष्‍ट नहीं कर रहा बल्कि यहीं के कुछ सत्‍ताधारी लोग बर्बादी का नेतृत्‍व संभाले हुए हैं।
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    बात तो आपने पते की कही है ....

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  4. अनावश्यक बोलना अपनी ही ऊर्जा का क्षय है..मौन को साधना कठिन है इस वाचाल जगत में..

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  5. आजकल हम सभी क्षेत्रों में निरर्थक वार्ताकारों से घिरे हुए हैं...

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  6. आपने बहुत अच्छी बात कही है आपका एक दम सटीक आकलन
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

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  7. Namashkar Vikesh.Tum sahi mai bahut acha likhte ho. words bhi nahi mil rhey hain likhne ke liye. U know tumhe hamesha se dekh kr lagta tou tha tumhara nature serious hai but us seriousness ka reason lgta tha ki tum family se dur ho tou may be isly shaant chup chaap rehte ho but aaj tumhare poems tumhare notes tumhare feelings thoughts read krke aaj pata chala ki i was wrong :). itna deeply apni surroundings ko dekhte ho phir unko apne sundar words mai express krte ho. :) awesome work. Comments jyada badey ho gaye hain. mujhe tumahri tarah acha likhna nahi aata simple language mai likha hai :) sorry..:) Stay healthy n God bless. Jai Guru Dev. :)

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