महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, March 2, 2013

अपना हिन्‍द अपनी हिन्‍दी !




समय की असीमित गहराई में समाकर पिछला माह भी व्‍यतीत हो गया। मार्च की प्रथम तिथि। अभी-अभी रात्रि के प्रथम प्रहर में मस्तिष्‍क में यह धारणा कौंधी कि हमारे साथ समय कितनी अल्‍पावधि के लिए है। हम उसे व्‍यतीत होते हुए देखते हैं और सोच नहीं पाते कि यह कभी रुकनेवाला नहीं है। समयावधि हमारे लिए संवेदनशील नहीं हो पाती। भौतिक वस्‍तुओं के भण्‍डारण और स्‍वामित्‍व का अहं हमारी मानविक इन्द्रियों को चूस कर सुखा गया है। हमारी कमजोरी यही है कि उमंग-तरंग से सम्‍पूर्ण प्राकृतिक जीवन का समय हम निरर्थक पूंजीचक्र में फंसकर, व्‍यक्तिगत अहंकार से बन्‍धकर तथा आधारहीन आधुनिक सामाजिक संगठन के नीति-नियमों में पलकर बिता रहे हैं। हमें यह नहीं ज्ञात है कि सामाजिक विकास के नाम पर नीति-नियन्‍ता कितना द्विअर्थी बना हुआ है। हमारा मस्तिष्‍क क्‍यों नहीं सोचता कि रोटी, वस्‍त्र एवं घर के अतिरिक्‍त अन्‍य विलासी सामग्रियों का चलन समाज में क्‍यों व्‍याप्‍त हुआ?

       यह इसलिए हुआ कि एक बड़े जनसमूह को कुछ विलासी वस्‍तुओं के मोह में प्रविष्‍ट कराओ और तब वे इन्‍हें प्राप्‍त करने के लिए अपने हाड़-मांस का मुख्‍य उद्देश्‍य अर्थात् प्राकृतिक कर्म विस्‍मृत कर एक स्‍तर पर बिना नियम-कानूनों के चलनेवाले शासकों के अधीन रह उनके लिए घिसते रहें, वस्‍तुएं उत्‍पादित करने का श्रम बनें, पूंजी का कुचक्र चलाएं और विलासिता के जंजाल में आकंठ डूबते रहें। इससे इतर शासक-वर्ग, पूंजीपति समाज अपने लिए समाज को संगठित करे, उन्‍हें अपने स्‍वार्थानुकूल चलाए। यही तो हो रहा है।

       पिछले दिनों की वर्षा से पर्यावरण में रात्रि को शीताधिकता हो आयी। आंखों के लिए जलवायु एवं प्रकृति के दृश्‍य अत्‍यन्‍त सुहाने हैं। व्‍योम, चन्‍द्रमा, सितारे स्‍पष्‍ट दिखाई देते हैं। दिल्‍ली और राष्‍ट्रीय राजधानी जैसे नारकीय वातावरण में ऐसा प्रकृति रुप भ्रम लगता है। मैं उलझा हुआ हूँ। समाज, शासक, जनता, संसार, धर्म, निर्धन, धनिक इत्‍यादि शब्‍दों का दर्शन मुझे विचलित करता है। मैं असहज हूँ। विद्रोह के लिए आत्‍मा में ध्‍वनियां गूंज रही हैं और मन-मस्तिष्‍क बारम्‍बार उद्वेलित हो रहे हैं।

      हम क्‍या हैं, कैसे हैं, क्‍यूं हैं, किस आधार पर हैं, ये प्रश्‍न एक संवेदनापूर्ण मनुष्‍य के लिए अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण हैं। परिवार, परिवेश, समाज, सम्‍बन्‍ध, राष्‍ट्र और संसार के मध्‍य हमारा होना हमारी जड़ों के कारण है। अपनी जड़ें भूलने का तात्‍पर्य है मानव से पशु होना। क्‍या हम पशुवत् रहना चाहते हैं? जब कोई कहता है कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है, उस समय कहनेवाले का मानवीय-विवेक क्षीण होता है। वह निपट मूर्खता में ऐसा कहता है। मानव एवं मानवता का अस्तित्‍व जड़, संस्‍कार, मूल्‍य और सर्वोपरि धर्म के बिना हो ही नहीं सकता। इन मानवीय घटकों से जुड़ने के लिए हमें अपने पूर्वजों के जीवन-संस्‍कारों का अनुसरण करना होता है। इस हेतु जीवन-संस्‍कार साहित्‍य का अध्‍ययन परम आवश्‍यक है। साहित्‍य की धर्मानुकूल भाषा है संस्‍कृत या उसका सरलीकरण हिन्‍दी। युगों-युगों से चलता आया मनुष्‍य जीवन समुचित दिशा तब ही ग्रहण करेगा जब वह अपनी जड़ें सींचेगा। जब वह स्‍वयं की उत्‍पत्ति, विकास एवं आत्‍म-अभिन्‍यास के अवयवों जड़, मूल, संस्‍कार, मूल्‍य, धर्म, भाषा के प्रति चिरस्थिर रहेगा।

       लेकिन दुख है कि आधुनिक जीवन के अभिरक्षक तथा अभिभावक हमारे राष्‍ट्रीय नेताओं के पास इस दृष्टि का पूर्णाभाव है। तुर्कों, मुगलों, अंग्रेजों का उपनिवेश रह चुका भारतीय भूखण्‍ड औपनिवेशिक कालखण्‍ड में अपने मूल्‍यों, मान्‍यताओं, भाषा के लिए इतना अलगाववादी नहीं हुआ, जितना कि स्‍वतन्‍त्रता के उपरान्‍त है। 

मूल्‍य और मान्‍यताएं तो शनै:-शनै: अपने मूल लक्ष्‍य एवं उद्देश्‍य से भटक ही रही हैं या कहें कि पूर्णरुप से पथच्‍युत हो चुकी हैं, परन्‍तु भा‍षा भी अपने ही घर में अनेक कष्‍ट झेल रही है। कुछ लोग हैं जिनमें अभी भारतीयत्‍व विद्यमान है, जिन्‍हें अपने मूल्‍योंमान्‍यताओं, संस्‍कृतियों और भाषाओं के प्रति स्‍वाभाविक लगाव है। इन्‍हें इनका अधिकार दिलाने के लिए वे कड़ा संघर्ष कर रहे हैं।

ऐसे ही एक व्‍यक्ति हैं न्‍याय और विकास अभियान के संयोजक श्री श्‍याम रुद्र पाठक। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्‍त करवाने से लेकर अनेक आंदोलन चलानेवाले श्री पाठक सर्वोच्‍च न्‍यायालय और उच्‍च न्‍यायालयों की कार्यवाही राष्‍ट्र भाषा हिन्‍दी सहित अन्‍य भारतीय भाषाओं में करवाने के लिए यूपीए और कांग्रेस अध्‍यक्ष के निवास पर सत्‍याग्रह कर रहे हैं। वे 4 दिसंबर 2012 से निरन्‍तर सत्‍याग्रह पर हैं। उनके अनुसार संविधान की मूल भावनाओं का उल्‍लंघन कर स्‍वतन्‍त्रता के 65 वर्ष बाद भी न्‍याय पाने के लिए लोगों को विवश होकर अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है। अभी उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और बिहार के उच्‍च न्‍यायालयों में ही हिन्‍दी के वैकल्पिक प्रयोग की अनुमति है। सन् 2002 में छत्‍तीसगढ़ की हिन्‍दी में, 2010 में तमिलनाडु की तमिल में तथा 2012 में गुजरात की गुजराती में न्‍यायालयी कार्यवाही की मांग को केन्‍द्र सरकार ने ठुकरा दिया। उन्‍होंने यह अभियान मार्च 2012 में प्रारम्‍भ किया था। इस अन्‍तराल में उन्‍हें कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। कई बार उन्‍हें पुलिसवाले पकड़कर थाने में बन्‍द कर देते। थाने से छूटते ही वे पुन: सत्‍याग्रह करने बैठ जाते हैं। दुख इस बात है कि हिन्‍दी प्रेमियों का कोई संगठन या दल आंदोलन में अभी तक उनके साथ जुड़ नहीं पाया है। आशा है कि हिन्‍द के लाल और हिन्‍दी प्रेमी शीघ्रातिशीघ्र पाठक जी के साथ मिलकर सत्‍याग्रह को इसके लक्ष्‍य तक पहुंचाने में सहायक बनेंगे। 


      






9 comments:

  1. सार्थक चिंतन एवं विचारणीय पोस्ट...

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  2. अच्छा लेख |सार्थक चिंतन |
    आशा

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  3. बढ़िया मुद्दा और गंभीर पोस्ट ...

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  4. श्याम रूद्र जी जैसे चिंतनशील व्यक्तियों की आवश्यकता है तभी हमारी भाषा उचित सम्मान पा सकेगी.
    गंभीर विषय पर अच्छा लेख.

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  5. बहुत सारगर्भित और सशक्त आलेख...

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  6. हिन्दी के सम्मान का संघर्ष निश्चय ही निष्कर्ष लायेगा।

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  7. चिंतन करती सामयिक विषय पे बेहतरीन पोस्ट ...
    राष्ट्र भाषा को सामान हम खुद ही दिला सकते हैं ...

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  8. shayam ji ko hamara dil se samrthan hi, hindi ko laker jitane bhi NGO chal rhe hia un ki vastvikta samne aa gaee hi

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  9. एक सार गर्भित लेख .........

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