महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, March 18, 2013

वैरागी दोपहर



मैं अकेला राह में, प्रसन्‍नचित मौसम प्रभाव से
दोपहर है और मैं कहीं से घर आ रहा हूँ। सड़क पर पैदल चलते हुए लग रहा है जैसे मौसम के उड़नखटोले में घूम रहा हूँ। याद आया कि छह या सात दिन बाद होली है। उसके स्‍वागत में मौसम की तैयारियां चरम पर हैं। वाह रे नीले आसमान कितना सुन्‍दर बना है तू! पेड़ों की हरी पत्तियां धूप में चमक रही हैं। कुछ पेड़ों की पीली और रंग-बिरंगी पत्तियां हवा के झोंकों से यहां-वहां झड़ रही हैं। कुछ झड़ के सड़क के दाएं और बाएं एक ढेर में बदल गई हैं। लोगों का आवागमन दोपहर में कम है। मैं स्‍वयं को सड़क का राजा मान कर, बहुत मध्‍यम गति से चलता हुआ मौसम के दिव्‍य अनुभवों को आत्‍मसात कर रहा हूँ।
सामान्‍य दिनों में नर्क लगनेवाला यह शहर, इसकी सड़कें, गलियां, लोग अचानक बहुत सुन्‍दर लगने लगे हैं। रास्‍ते में आते-जाते जो भी दिखता है बड़ा अच्‍छा लगता है। मैं उसका मुख देख कर प्रेमिल हो मुस्‍कुरा जाता हूँ। वह भी अचम्‍भे और खुशी से प्रसन्‍न हो जाता है। अपनी और मुझ से हाथ मिलाते व्‍यक्ति की रास्‍ते पर पड़ी परछाई देखता हूँ। धूप से आलिंगनबद्ध हो मन्‍द-मन्‍द लहराते वृक्षों की छायाएं निहारते हुए अपनी चाल और धीमी कर देता हूँ। हिलती छायाओं को जेब में भरने का विचार कौंधता है। मन ही मन खुद पर हंसता हूँ। गलियों के घर और इनकी काली परछाइयां उदार प्रतीत होती हैं। ये सोच कर कि घर आनेवाला है मैं चलना बंद कर एक जगह रुक जाता हूँ। इस प्रकृति निधि को अपने अन्‍दर भरपूर जमा कर लेना चाहता हूँ। आज के इस जीवन अनुभव को खूब जी लेने की इच्‍छा होती है। मोबाइल फोन बजता है। मोबाइल रिंग की टोन बहुत बनावटी लगती है। सोचा हवा की सरसराहट की कोई रिंग टोन होती तो कितना अच्‍छा होता! बेल का पेड़ हवा से ऐसे हिल रहा है जैसे मां का प्रेम दुधमुंहे बच्‍चे को लोरी सुना रहा हो। सड़कों पर उड़ते सूखे पत्‍तों की खड़खड़ाहट दोपहर को वैरागी बना रही है। हवा के संग लहराते शीशम के छोटे और गोल पत्‍तों के बीच से आकाश देखा तो अपनी उपस्थिति भ्रम लगने लगी।
वैरागी दोपहर
पीठ पर लगती धूप सर्वाइकल के दर्द को सेक रही है। मैं बीड़ी सिगरेट नहीं पीता। लेकिन अभी मन करता है कि एक सिगरेट पिऊं। उसके धुएं में अपने शरीर को विलीन करुं। अचानक मुझे शराब, बीड़ी और सिगरेट पीनेवालों से एक लगाव हो जाता है। अब मुझे कुछ भी ऐसा याद नहीं आ रहा, जो मेरी आंखों को अखरे। मेरी नजर ईर्ष्‍याविहीन हो गई है। आसमान और हवा के बीच नजरें टिकाए हुए हूँ। दृष्टि को हटाए बिना ही महसूस हुआ कि पास में कोई सिगरेट पी रहा है। उसकी गंध मुझे दोपहर की धूप में मन्दिर में जलती अगरबत्‍ती की सुगन्‍ध लगती है। ऊपर आसमान की ओर बढ़ता धुंआं रोटी सेकते गांव के चूल्‍हों से निकलनेवाले धुंएं सा लगता है। धुंएं के गुच्‍छे उड़ाता चेहरा देखने की सूझी तो पाया कि अधजली, पैर से मसली हुई सिगरेट के अलावा कोई नहीं था। 
सड़क छूट गई है। राजा रंक हो गया है। मैं वापस घर में हूँ। दोपहर का खाना खाते हुए खिड़की से देखता हूँ कि बिजली के तार पर दो कबूतर बैठे हुए हैं। आकाश, धरती, धूप, पेड़, हवा, मौसम से प्रभावित कबूतर धीरे-धीरे पास आए। दो एक बार उन्‍होंने चोंच से चोंच मिलाई। अन्‍त में संभोग किया और चलते बने। उन्‍हें देने के लिए पके हुए चावल के दाने मेरी हथेली में चिपके रह गए।
(१७ मार्च, २०१३ दोपहर का संस्‍मरण)

20 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

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  2. शहर का खाका आँखों के सामने ला दिया ...
    होली आने वाली है ... पर बदलाव नहीं आयेगा ...

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  3. बहुत सुन्दर संस्मरण भाई पढ़कर आनंद आ गया |

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  4. अनुभूति की सघनता और विरलता दोनों गुंथी हुई हैं इस संस्मरण में भाषागत सौन्दर्य देखते ही बनता है कल्पना की अभिनव परवाज़ भी .शैली की कसावट और रूप विधान भी .

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  5. एक अकेली साथी मेरी,
    आवारगी...

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  6. बहुत प्रभावी मनभावन शब्द चित्र...

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  7. वाह क्या गजब का चित्रण किया है समूचे वातावरण का
    बधाई

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  8. गुनगुनाता हुआ है ये 'वैरागी दोपहर'

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  9. वर्रण करने और विवरण देने दोनों में ही आप माहिर हैं बैरागी दोपहर अपने आगोश में क्या कुछ न समेटे रही .शुक्रिया आपकी बेश कीमती टिपण्णी के लिए .

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  10. हवा की सरसराहट की अगर रिंग टोन मिले तो मैं भी इसे बनाना चाहूँगा। मुझे वीरेंद्र शर्मा जी की टिप्पणी बड़ी अच्छी लगी, इसलिए नई टिप्पणी करने की जरूरत नहीं समझता।

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  11. विकेश जी ,बैरागी दोपहर रूपकात्मक तत्वों का समावेश लिए आगे बढ़ी है .फाग का महीना वैसे भी जंगल में आग लगा देता है मैंने खुद भी देखे हैं सागर (मध्य प्रदेश )की पठारिया हिल्स में बसी घाटी में पलाश का आग लगाता जंगल ,बादलों की कलात्मक वेशभूषा .शाम के झुरमुठ की बादलों के रंगों में आँख मिचौली .पोस्ट मनभावन है तो टिपण्णी रोज़ की जा सकती है .और यह पोस्ट बहुत खूब सूरत बन पड़ी है .बधाई .फाग की प्रीत भी फाग की रात भी .

    शुक्रिया आपकी सार्थक समालोच्नात्मक,विश्लेषण प्रधान टिप्पणियों का .

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  12. जीवन स्वयं से जुड़ा रहे ....इतना तो हो....

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  13. आपकी विवरणात्मक शैली और कंटेंट्स का ज़वाब नहीं .शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का .

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  14. अदबदाकर किया गया काम /फैसला ?

    फैसला लेने से पहले किसी बात के सभी पहलूओं पे ठीक से सोच लेना ,किसीबात को पूरी तरह सोचना समझना ,तब सब कुछ जानते बूझते हुए ऐसा हुआ तो वैसा हो सकता है अंजाम की चिंता किए बिना कर लेना कुछ भी अदबदाकर करना कहलायेगा .

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  15. आपकी सारगर्भित टिपण्णी ने इस आलेख का वजन बढ़ा दिया ज़नाब .शुक्रिया .इसकी अगली कड़ी ज़रूर पढ़ें .

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  16. अनुभूति तथा अभिव्यक्ति दोनों पर ही आपकी गहरी पकड है । कहाँ आगए हैं शहर की भीडभाड में ।

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  17. जैसा महसूस किया वैसा लिखा..प्रभावी बैरागी दोपहर

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  18. शुक्रिया आपकी तवज्जो का .प्रोत्साहन का .

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  19. बहुत निकट से वैरागी दोपहर का अवलोकन और सुंदर प्रस्तुति!!

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  20. बहुत निकट से वैरागी दोपहर का अवलोकन और सुंदर प्रस्तुति!!

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