Thursday, March 14, 2013

आधुनिकता से लिपटा जीवन-भ्रम

जीवन का भ्रम, भ्रम का जाल

सानी से देखा मैंने भी अपने इर्द-गिर्द के मरनेवालों को। मरने से पहले उनमें कई लोग हंसते, रोते होंगे। दुखी और सुखी होते होंगे। बातों को दिल से महसूस करते होंगे। जीवन अनुभवों की आत्मिक समीक्षा करते होंगे। कईयों को छोटी सी छोटी सुविधा के लिए भी जीवन-संघर्ष से गुजरना पड़ा होगा। तो कई जन्‍म से ही अमीरी, विलासिता से पूर्ण रहे होंगे। इनमें से उदास लोगों की कदमों की आहट को मैं अच्‍छी तरह से भांप सकता था। कितनों की शक्‍ल ही देख कर बता सकता था कि कोई किस प्रवृत्ति या प्रकृति का व्‍यक्ति है। पर क्‍या करना इन सब बातों को थाम कर। क्‍योंकि जानेवाले अपने प्रभाव को इतना भी वैभवशाली नहीं बना पाए कि हम उन पर, उनके कार्यों पर कुछ अचरज कर सकें। मृत्‍यु के नाम पर कुछ दहल जाएं। बस भुलाना और सब कुछ बिसार देना हमारी आदत में घुल गया है। हम अपनी निकट जरुरतों को छोड़ बाकी सब कुछ भूलते जाते हैं। यदि मानवता की सेवा में उन्‍होंने कुछ कार्य किए होते तो वे हमेशा जीवित ही रहते। शरीर उनका भले ही मिट जाता पर उनकी यादें तो अमिट होतीं। लेकिन अपने साथ रहनेवालों को समाप्‍तप्राय: देख, अनुभव कर भी हम चेत नहीं रहे। उन्‍हीं की तरह हम भी जीवन-समय निरर्थक गुजार रहे हैं।
जनसंख्‍या ने इतना विशालकाय आकार धारण कर लिया कि हमें ओर-छोर की चिंता ही कहां रहती है। किसी को भी अपने अलावा कुछ नहीं दिख रहा है। अपने को देखने के लिए हमारी आंखें सम्‍पूर्ण हैं। शेष समय वे अन्‍धी प्रतीत होती हैं। आदमी पग-पग पर अभिनय कर अपना रुप और विचार बदल रहा है और ऐसे में उसके बारे में जानना कठिन लगने लगा है कि वह किस धारा का मनुष्‍य है। मनुष्‍य किस आधार पर मनुष्‍य है, यह विचार उत्‍तर के बिना ही रह जाता है। अन्‍तत: विचार करुण विलाप करता हुआ एक भाव बनता है और इस तरह दुनिया की बेरुखी से मटियामेट हो कर कालविलीन हो जाता है।
अपने को मैंने कई बार समझाया कि अन्‍तरात्‍मा की बात सुन कर निर्णय कर। पर न जाने क्‍यों निर्णयों के समय मैं अपंग हो पड़ा रहता हूँ। इस दौरान खुद पर विश्‍वास भी नहीं रहता। मैं कहता हूँ भगवान पहले किसी भी व्‍यक्ति को इतना मजबूत बनाया जाए कि वो बड़े से बड़ा कार्य भी सहजता से निपटता हुआ चले, तभी उसको जन्‍म दिया जाए। अन्‍यथा आदमी पैदा ही न हो धरती पर। क्‍योंकि तेरी बनाई इस दुनिया में तेज-तर्रार आदमी सीधे आदमी को सीधा भी नहीं देख सकता और अपने जैसा बनने पर उससे दुश्‍मनी भी करता है। ऐसे में सीधे मनुष्‍य के पास कौन सा रास्‍ता बचता है जीवन के लिए, इस प‍र अवश्‍य विचार करना प्रभु।
जीवन अंकुर फूटे हुए सदियां बीत चुकी हैं। तब से अब तक जीवन-स्‍तर कई चरणों से होता हुआ इस सदी के इस समय तक पहुंच चुका है। आज वैज्ञानिक आविष्‍कारों और अनुसन्‍धान से तैयार अनेक मानव सहायक मशीनों की उपलब्‍धता ने जहां एक ओर आदमी को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी ओर इससे जीवन का स्‍वाभाविक चलन भी खत्‍म हुआ है। औरों के बारे में तो पता नहीं पर मैं मशीन और मानव की अवधारणा के बीच झूल रहा हूँ। मशीनीकरण की अपेक्षा मुझे मानवीय अवधारणा ज्‍यादा प्रभावित करती है। मेरी वैचारिक दृष्टि मानवता से प्रेम करती है। मुझे लगता है यदि मानवता की कीमत पर मशीनी उत्‍पादन ऐसे ही होता रहा तो आविष्‍कारक और उत्‍पादक ही दुनियाभर में नजर आएंगे। मनुष्‍य मिट जाएगा, और यदि मनुष्‍य ही नहीं रहेगा तो फिर मशीनी गठन-पुनर्गठन किस के लिए!
मशीनों से सजे आधुनिक जीवन को जीते-जीते और मौत आने तक मरनेवालों में गूढ़ मानवी भाव कभी नहीं जागा। वे अपने जीवित रहने के समय को स्‍थायी मान बैठे थे। शायद मौत से पहले भी उन्‍हें ऐसी किसी आधुनिक मशीन की लालसा रही हो, जो उन्‍हें वापस जीवनदान दे सके। लेकिन ऐसा कहां होता है कि मौत को भी आधुनिकता वश में कर ले। जीवन से आधुनिकता कितना भी खेले, कैसे भी खेले पर मौत के सामने ये भी बेबस है। आधुनिकता से लिपटे जीवन-भ्रम को सच का दर्पण दिखाने की सख्‍त जरुरत है। इसके लिए हमें परंपरा से जुड़ना होगा। उसे फिर से जीवन बनाना होगा। मानवता से प्रेम करना होगा। तब ही जीवन जीते हुए मानव सच्‍चे सुख से सम्‍पूर्ण होगा और मृत्‍यु को भी सहजता से स्‍वीकार कर सकेगा।

13 comments:

  1. ये आत्मविवेचन है या कुछ ओर ... जो भी है एक उलझन है मन की जो कहीं भी टिकने नहीं देती ... मन को साधना बड़ा ही मुश्किल ओर दुष्कर कार्य है ... ओर शायद भगवान तो कुछ कर भी न सके इसमें ...

    ReplyDelete
  2. बहुत सारगर्भित विवेचन..भाषा और शैली के लालित्य ने विषय को और भी रोचक बना दिया..

    ReplyDelete
  3. मृत्यु एक अडिग सच है ....
    सार्थक लेख

    ReplyDelete
  4. अंतिम पंक्तियों में आपने जो कहा उसे पूर्णतः सहमत हूँ। मगर आज के आधुनिक युग में यह बातें सपनों सी काल्पनिक नज़र आती है। क्यूंकि यूं तो इस दुनिया में अगर चाहो तो सब कुछ संभव है। मगर अफ़सोस कि अब इस तरह कि बातों को कोई सोचता ही नहीं और जो सोचता है, वह कुछ करता नहीं, केवल सोच-एक-सोच बनकर ही इस दुनिया से विदा हो जाती है।

    ReplyDelete
  5. राह अपनी, रात में घुल जायेगी,
    क्या पता, कल सुबह कैसी आयेगी।

    ReplyDelete
  6. वैचारिक बातें .... जीवन कुछ ऐसा ही हो चला है....

    ReplyDelete
  7. बढ़िया ललित निबन्ध सी खनक लिए है यह पोस्ट हम सब परम्परा च्युत हो साईंबोर्ग बन गए हैं .कई तो आधा काम मशीन से ही कर रहे हैं अंतरजात मशीन से जो शरीर में फिट है अब कोई IOL(नेत्र लेंस फिट करवाए )घूम रहा है कोई दिल गति नियामक ,दिल की गति को तेज़ धड़काये रखने वाला यंत्र pace maker लगवाये टहल रहा है .कई मरने के बाद शव का प्रशीतिकरण करवा रहे हैं क्या पता कल जीवन तत्व फिर से कोई उनकी काया में डाल दे .वाह! मशीन एक तेरा ही सहारा .शुक्रिया आपकी उत्साह वर्धक टिपण्णी का ऐसे टिपण्णी अक्सर लेखन को एड़ लगाते रहते हैं .परम्परा और मनुष्य का संग साथ हो ही ज़रूरी यह भी नहीं है मानवता के बुनियादी तत्व आधुनिकता के साथ भी बने रह सकते हैं सवाल चयन का है .

    ReplyDelete
  8. कैसे कोई अपने जड़ से कट जाता है ? समस्या का मूल कारण बन जाता है..सही कहा है.

    ReplyDelete
  9. इस चक्कर में बस सहजता भूल गए ...

    ReplyDelete
  10. आर्टिफिशियल हार्ट लंग मशीन है न ,जो व्यक्ति को सालों साल क्लीनिकली लाइव रख सकती है .इसी लिए अंतिम डेथ ब्रेन डेथ ही है .सेरिब्रल डेथ इस फाइनल डेथ .

    ReplyDelete
  11. bahut achcha likha hi, magar paise vala to apne ko bhagwan maan rha hi
    in lakho se saayad kisi ki neend tute

    ReplyDelete