Sunday, March 10, 2013

वो समय ये समय



समय की विडंबना

यह वो समय था जब नोएडा जैसे औद्योगिक शहर में हम बच्‍चे लोग लट्टू, कंचे, खो-खो, पकड़मपकड़ाई और छुपम-छुपाई खेल खेलते थे। गर्मियों की छुटि्टयों में हम लोग कुछ पैसे में उधार ला कर कॉमिक्‍स पढ़ते थे। लूडो, कैरम बोर्ड में तपते दिन कब निकल जाया करते पता ही नहीं चलता।

टी.वी. के नाम पर मात्र दूरदर्शन एक चैनल था। वह भी बड़ों और बच्‍चों द्वारा बड़े चाव से देखा जाता था। पांच-दस मिनट तक तो टेलीविजन पर आनेवाले कार्यक्रमों का क्रम ही चलता रहता था। उसमें भी टी.वी. मालिक की हिदायत होती कि कोई शोर न करो, चुपचाप देखो। टी.वी. और वीडियो के जिन फास्‍ट मूविंग चित्रों से दिमाग को आज परेशानी होती है, पहले वे बहुत ही आराम से टेलीविजन स्‍क्रीन पर आते-जाते थे। हम जमीन पर पालती मार के बैठ बहुत ही तन्‍मयता और शांति से कृषि-दर्शन का कार्यक्रम तक देखते थे। समाचार बुलेटिन के वक्‍त तो सब लोग टी.वी. देखने के लिए ऐसे स्थिर हो रहते जैसे दूसरे ग्रह के किसी प्राणी को धरती पर उतरते हुए देख रहे हों। हम बच्‍चों के लिए ही-मैन, रामायण, सिंहासन बत्‍तीसी, मालगुडी डेज जैसे नाटक किसी परीलोक के चलचित्र जैसे होते थे, जिन्‍हें हम इतना तल्‍लीन हो कर देखते कि नाटक के पात्रों के एक-एक संवाद को कंठस्‍थ कर लेते, एक-एक चलचित्र को वीडियो की रील की तरह अपनी स्‍मृति से चिपका देते। कभी-कभी किसी घर में शनिवार की रात को वीडियो दिखाया जाता था। रातभर तीन फिल्में  दिखाई जाती थीं। सब लोग वीडियो देखने के पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अपने-अपने काम निपटा कर जमीन पर पंक्ति में बैठकर फिल्में  देखते थे। सबसे पहले संतोषी माता जैसी धार्मिक फिल्में  लगाई जातीं थीं। उसके बाद एक भूतोंवाली और एक साधारण फिल्म दिखाई जाती। सुबह तक लोग आंखें फाड़कर टी.वी. की स्‍क्रीन पर चिपके रहते थे।

ऐसा नहीं था कि हम सारा समय खेलते या टी.वी. ही देखते रहते थे। पढ़ाई-लिखाई से लेकर सभी जरुरी कामों को भी वक्‍त पर निपटाते थे। सुबह दूध लाते थे, बड़ों के कई रोजमर्रा के कार्य करते थे। छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए मैं मकान बनाने के लिए सीमेंट, सरिया, रेत, रोड़ी, बदरपुर की खरीदारी करता था। भैंसाबुग्‍गी में ईंटें ढोनेवाले के साथ बैठ कर ईंट की दूकान से घर तक आता था। कहीं ईंटवाले ने कम ईंटें न रखीं हों या रस्‍ते में कहीं पर कोई ईंट गिर न जाए, यह देखने की जिम्‍मेदारी भी मेरी ही थी। ऐसी ही अनेक जिम्‍मेदारियों का निर्वाह करते हुए, खेलते-कूदते, पढ़ते-लिखते कब समय गुजर गया, पता ही नहीं चला। अस्‍सी के दशक के आखिरी दो-तीन और नब्‍बे के दशक के शुरुआती तीन-चार वर्षों तक शहरी जीवन थोड़ा शहरी होते हुए भी बहुत प्रेमिल, स्‍नेहिल, सहयोगी, जिम्‍मेदाराना और उमंग-तरंग से परिपूर्ण था।

नब्‍बे के दशक में भारत में उदारीकरण की शुरुआत हो रही थी। शायद बड़े-बुजुर्गों और संवेदनशील लोगों को इसके संभावित खतरे दिखाई देने लगे थे। इसलिए उस समय वे हमें देख कर कहते कि इन बच्‍चों के भविष्‍य के बारे में चिंता होती है। हममें से ज्‍यादा बच्‍चे उनकी बातों को हंसी-ठट्टे में उड़ा दिया करते और सोचते कि ये क्‍या और कौन सी बातें कर रहे हैं।

आज उनकी कही गईं और हमारे समझ से बाहर रहीं बातें गम्‍भीरता से याद आती हैं। वाकई हमारे भविष्‍य के बारे में उनकी चिंताएं उचित थीं। वे शायद हताश थे कि परम्‍परागत जीवन को बचा कर रखने में उनके प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं। इससे भी बड़ा डर उन्‍हें अपनी जड़ों से खुद के खदेड़े जाने का था। वे आधुनिक विभीषिका के शुरुआती प्रयोगों से ही इतने विचलित हो गए थे कि उनका डर उनमें अकारण ही बार-बार उभर आता था।

आज के बच्‍चों को मोबाइल, इंटरनेट से लेकर तमाम आधुनिक सुविधाओं (दुविधाओं) का प्रयोग करते हुए देखता हूँ तो एक बार तो वे बड़े तेजतर्रार लगते हैं, पर दूसरे ही पल जब उनको असहाय व्‍यक्तियों, बड़े-बुजुर्गों की असभ्‍य तरीके से अनदेखी करते हुए देखता हूँ तो अपने बालपन के बुजुर्गों की हमारे भविष्‍य की चिंताओं को याद करने लगता हूँ। जब बच्‍चों, किशोर, युवक और युवतियों को इस हद तक गैर-जिम्‍मेदार पाता हूँ कि वे अपने घर का छोटे से छोटा काम भी बिना किसी आत्‍मप्रेरणा के और बगैर बताए करने को तैयार नहीं हैं तो मैं आत्‍मग्‍लानि से घिर जाता हूँ। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच मध्‍यस्‍थता करने की बात पर अपनी उम्र के लोगों के लिए शुभकामनाएं करता हूँ। परम्‍परा और आधुनिकता दोनों में संतुलन स्‍थापित करने, विकास और विनाश के बीच के अन्‍तर को देखते हुए हम लोगों की यह बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी है कि हम मानवता की परम्‍परा को भी बनाए रखें और आधुनिक विकास के सही-गलत परिणामों की भी पड़ताल करते रहें, ताकि नई पीढ़ी का संसार-बोध संतुलित हो सके।

9 comments:

  1. जाने कहाँ गए वो दिन....पुरानी यादें ताज़ा करदीं..

    ReplyDelete
  2. अतीत के चलचित्र
    सुंदर सर्जन

    ReplyDelete
  3. समय बदल कर और क्या-क्या दिखाएगा..

    ReplyDelete
  4. कोई लौटा दे वो प्यारे-प्यारे दिन
    अब कटते दिन उन्हें गिन गिन

    ReplyDelete
  5. हम सीमित में राह ढँूढ़ते थे, बच्चे असीमित में।

    ReplyDelete
  6. बहुत सही कहा आपने ...
    कुछ यादें दौड़ गईं मानस पटल पर ,,,

    ReplyDelete
  7. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

    ReplyDelete
  8. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

    ReplyDelete