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Friday, March 1, 2013

अव्‍यवस्थित, कुप्रबन्धित उत्‍तराखण्‍ड परिवहन निगम

उत्‍तराखण्‍ड परिवहन निगम की बसों में यात्रियों को अनेक सुविधाओं से दो-चार होना पड़ता है। खासकर पौड़ी, कोटद्वार, देहरादून तथा अन्‍य पहाड़ी क्षेत्रों के लिए चलनेवाली बसों में यदि आपको कभी यात्रा करने का मौका मिले तो ये दिक्‍कतें आप प्राय: अनुभव करेंगे। कोटद्वार और देहरादून जानेवाली बसें वहां जानेवाले तथा वहां से आनेवाले यात्रियों की जरुरतों के अनुसार चलाई गईं थीं। लेकिन यह देखकर अचरज और दु:ख होता है कि इन दोनों स्‍थानों के यात्री खड़े होकर तथा छोटे-छोटे स्‍टेशनों के यात्री बैठकर यात्रा करते हैं। स्‍थानीय गुंडई तत्‍व असामा‍जिक व्‍यवहार करते हुए पहले तो अपनी उपस्थिति से ही आंखों को चुभते हैं, ऊपर से ये धूम्रपान, मद्यपान इत्‍यादि का सेवन चलती बस में ही करते हैं। चालक और परिचालक अपनी प्रवृत्ति के अनुरुप किसी भी समाजविरोधी व्‍यवहार पर चुप्‍पी साधे रहते हैं। यह इसलिए होता है क्‍योंकि कहीं न कहीं अप्रत्‍यक्ष रुप से ये भी इन कुकृत्‍यों में सम्मिलित रहते हैं। सज्‍ज्‍न चालक और परिचालक अपवाद स्‍वरुप ही इन रुटों पर होंगे।
      नियमानुसार दिल्‍ली से कोटद्वार और देहरादून के लिए चलनेवाली बसें मेरठ बाईपास से जानी चाहिए। लेकिन मेरठ के असामाजिक व्‍यापारियों की दिल्‍ली से ढोकर लाई जा रहीं अवैध पेटियों/पैकेटों की आपूर्ति के लिए बसें शहर के अंदर से जाती हैं। शहर की दुरुह यातायात प्रणाली एवं अन्‍य कुव्‍यवस्‍थाओं के कारण यात्रियों के दो-तीन समय-घंटे यूं ही व्‍यर्थ हो जाते हैं। परिणामस्‍वरुप कोटद्वार की सात घंटे की यात्रा दस और देहरादून का दस घंटे का सफर बारह घंटे में पूर्ण होता है। रात्रि की यात्रा में इन स्‍थानों से कई डकैत गाड़ियों में बैठ जाते हैं और निर्जन क्षेत्र में पूरी बस के यात्रियों को हथियार दिखाकर लूट लेते हैं। ऐसी कई दुर्घटनाएं पूर्व में हो चुकी हैं।
सौ मीटर लम्‍बी बस में यदि 75 लोग कोटद्वार जानवाले होते हैं तो उनसे  प्रति यात्री 150 रुपए की गणना के अनुसार परिवहन विभाग को 11250 का राजस्‍व प्राप्‍त होता है, पर 75 लोगों की यात्रा को नर्क में झोंककर मात्र दो सौ रुपए के व्‍यक्तिगत लोभ में ये एक पेटी की आपूर्ति के लिए समस्‍त नियम-कानूनों को ताक पर रखके चलते हैं। आश्‍चर्य तब होता है जब न तो चालक-परिचालक को इस कुकृत्‍य का डर होता है और ना ही यात्रियों में इससे निपटने की किसी प्रकार की जागरुकता ही उत्‍पन्‍न होती है। सब कुछ ऐसी सामान्‍यावस्‍था में होता है मानो परिवहन निगम का कोई नियम हो। कोई एक दो जागरुक यात्री यदि इनके विरुद्ध खड़े होते भी हैं तो ये या तो बात की पूर्ण अनदेखी करते हैं या मेरठ, मवाना, बिजनौर और नजीबाबाद के यात्रियों के साथ मिलकर ऐसे यात्रियों को गलत भाषा का प्रयोग कर चुप करा देते हैं।
अंतर्राष्‍ट्रीय बस टर्मिनल से कोटद्वार जानेवाले यात्रियों से भरी हुई बस को स्‍थानीय बसों की तरह जहां-कहीं, जो कोई हाथ देता है, उसके लिए रोक दिया जाता है। इस तरह कई स्‍थानों पर बस के रुकने से समय की बर्बादी होती है और यात्रियों की असुरक्षा में वृद्धि होती है। अनेक प्रकार की वस्‍तुएं, दवाईयां और चूर्ण बेचनेवाले बस में चढ़ जाते हैं। कर्कश स्‍वर में वस्‍तुएं बेचने के लिए चिल्‍लाते हैं। इससे यात्रियों को असुविधा होती है। कई बार चालक गाड़ी चलाने से अपना ध्‍यान हटा इनके द्विअर्थी मुहावरों पर पीछे की ओर देखता है और इस कारणवश दुर्घटना हो जाती है।
      ऐसे ही एक बार कोटद्वार जाते समय सीलमपुर दिल्‍ली के निकट उत्‍तराखण्‍ड परिवहन निगम की बस मारुति ओमिनी से टकरा गई। उसके चालक ने बस द्वारा हुई अपनी गाड़ी की क्षति के लिए प्रदर्शन कर दिया। स्‍थानीय लोगों की सहायता से राष्‍ट्रीय राजमार्ग 119 को बाधित कर दिया। बस के चालक-परिचालक कारवाले से व्‍यर्थ वाद-विवाद में उलझने के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कर रहे थे। स्‍थानीय पुलिस चौकी को इस राजमार्ग अव्‍यवस्‍था की कोई सूचना नहीं मिली या वे अव्‍यवस्था को देखकर वापस लौट गए, ईश्‍वर जाने। लेकिन उस दिन भारत, उत्‍तर प्रदेश और अपने पर इतनी ईर्ष्‍या हुई कि मेरा बाह्य एवं भीतरी व्‍यक्तित्‍व कुन्‍द हो गया। कार का चालक बहुत छोटी क्षति के लिए हजार रुपए मांग रहा था। उसकी गाड़ी को अधिकाधिक दो सौ रुपए की हानि हुई होगी। बस के चालक-परिचालक को राजमार्ग बाधा, बस में बैठे लोगों के समय पर गंतव्‍य तक पहुंचने और व्‍यर्थ एकत्रित लोगों की भीड़ से कोई भय नहीं था। वे कारवाले को कह रहे थे कि हम एक रुपया नहीं देंगे तुझे।
इस निरर्थक लाग-डाट में एक घंटा व्‍यतीत हो गया। मुझे कोटद्वार पहुंचने की शीघ्रता थी। इसलिए मैंने उस व्‍यक्ति को समझाया कि हजार रुपए तो नहीं पर मैं आपको पांच सौ रुपया दे सकता हूं। वह मान गया। इसके बाद ही आगे की यात्रा निर्धारित हो सकी। इस दुर्घटना के उपरान्‍त भी चालक-परिचालक अपने राजकीय और सामाजिक दायित्‍व से विमुख ही थे। कोटद्वार पहुंचते-पहुंचते तक वे किसी न किसी कारण यात्रियों के लिए समस्‍याएं उत्‍पन्‍न करते रहे। वे अपने दोषों पर अंशमात्र भी लज्जित न थे।  
दिल्‍ली से पौड़ी जानेवाली उत्‍तराखण्‍ड परिवहन निगम की बस
   इस प्रकार की अनेक समस्‍याओं और असुविधाओं के उपरान्‍त भी उत्‍तराखण्‍ड परिवहन निगम स्‍वयं को ठीक नहीं करता। उसे केवल राजस्‍व से लगाव है। राजस्‍व स्रोत अर्थात् लोगों से उसका कोई लगाव नहीं है।

7 comments:

  1. उत्तर प्रदेश परिवहन से बदत्तर सेवा मैंने आज तक नहीं देखी | बचपन से इनमें सफ़र कर रहा हूँ वैसे अब तो खड़ंजे पर बैठ कर सफ़र कर दर्द सहने की आदत पड़ गई है | पर इनका कुछ नहीं हो सकता यह सब चोर और कामचोर हैं | इनकी हालत कभी नहीं सुधर सकती यह ता-उम्र बीमार ही रहेंगी |


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  2. मै खुद भुक्तभोगी रहा हूँ .. 2004 में हल्द्वानी से धामपुर ( बिजनौर ) की जर्नी को मै कभी भूल नहीं सकता . वैसे इस तरह के हालात पूरे देश में है ...कभी बिहार आकर देखिये !!

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  3. जिसकी जहाँ चलती है वे चला ही लेते हैं..दूसरों की परेशानी से क्या वास्ता..?

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  4. सभी राज्यों में परिवहन निगमों का यही हाल है..

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  5. इस एक क्षेत्र में ही नहीं देश के हर भू भाग में शायद ऐसा ही कुप्रबंधन है...... सच में विचारणीय

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  6. तुषार जी की बात से सहमत उत्तर प्रदेश परिवहन निगम सबसे खराब सेवा देता है.
    थोडा -बहुत शायद हर राज्य में यही हाल होगा .

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  7. व्यक्तिगत स्वार्थों से बाहर आयें तो भला हो व्यवस्था का।

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