Thursday, February 7, 2013

ईश्वर का सत्यांश




एक बच्चे की
आंखों की भाषा
प्रत्येक प्राकृतिक उपक्रम
देखने की उसकी अभिलाषा
कितनी संसार सम्मत है
अनंत संवेदनाओं में मस्त है
पक्षियों की आवाजाही
प्रौढ़ता को जो
अब सूझती भी नहीं पलांश को
बच्चे के लिए
अद्भुत आश्चर्य है
नील-नभ की
रंग-बिरंगी छटा में उभरते
मानव जनित चिन्ह
जैसे हवाई जहाज, राकेट का लम्बा धुंआ
उड़ती पंतगें और कतारबद्ध हो उड़ते खग
बच्चे को गुदगुदा जाते हैं
वह रोना बन्द कर देता है
निरपराधी हृदय के सहारे
एकटक हुईं मासूम आंखें
संसार के इन उपक्रमों को देखकर
संवदेनशील संजीवन बन जाती हैं
बच्चे का हाथ उठता है
वह अंगुलि को
इन विचित्र से लग रहे
दृश्यों की ओर करता है
और अपने को ईश्वर का
सत्यांश सिद्ध करता है






19 comments:

  1. बच्चे ईश्वर के ही तो अंश हैं..

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  2. अद्भुत भावभीनी अभिव्यक्ति...रचना के भाव अंतस को छू गए..

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  3. सुन्दर,सुकोमल भाव!

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  4. हृदयस्पर्शी...... बिटिया बहुत प्यारी है ...

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  5. हृदयस्पर्शी...... बिटिया बहुत प्यारी है ...

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  6. Very nice poem as usual by a very nice person. Harish

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  7. Very nice poem from an excellent writer. Keep it up. Harish

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  8. निर्मल बालमन! बहुत सुंदर रचना!

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  9. Bahut Sundar Bardan . निर्मल बालमन SAMAAJ ki BICHTRTAWO ko samajh main Laga Rahata hai...

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  10. Bahut Sundar Bardan . निर्मल बालमन SAMAAJ ki BICHTRTAWO ko samajh main Laga Rahata hai...

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  11. कोमल सुन्दर एहसास ..बहुत सुन्दर.

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  12. सुकोमल भावभिव्यक्ति...

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  13. ekdam sundar rachna.. pariyon si golmol....

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  14. मर्मस्पर्शी भावनाओं को अच्छी काव्याभिव्यक्ति दी है...
    ..बच्चे भगवान का ही रूप तो होते हैं!

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  15. सत्यांश तो सभी होते हैं पर अहंकार में भूले रहते हैं. सुन्दर रचना..

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  16. इंसान की निर्मलता अभी भी मिलती है बच्चे के कोमल मन में, अभी भी शेष है सत्यांश... सुन्दर अभिव्यक्ति...

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