Tuesday, February 19, 2013

रहस्‍यंभावी यात्रा










खुले नीले आकाश को
छूने के निकट
श्‍वेत तुषार पर्वत
हरियाली का विस्‍तार
सुश्‍वेत घन समूह
भरपूर नील नभ में
कहीं-कहीं हैं विद्यमान
इस प्राकृतिक छटा को
दूर से देख लगता
कि इसके निकट सन्निकट होते
तो क्‍या बात होती
इन प्राकृतिक दृश्‍यों के निकट पहुंच
एक बार पुन: हम किसी की
बहुत कमी महसूस करते
यह अभाव कभी प्रकृति के
सुरम्‍य दृश्‍यों को देख
वहाँ उनके निकट जाने की सोचता
और यदि वहां पहुंच भी जाता
तो एक संग एक रहस्‍यमय साथ
होने के अभाव में
कहीं और भटकने के लिए
तैयार हो जाता
प्रकृति सौंदर्य और जनशून्‍य स्थिति से
मन एक प्‍यार-भरा साथ
होने के लिए तड़प उठता है
यदि अपने प्रियतम के साथ रहकर भी
प्रकृत सुन्‍दरता से
मन इधर-उधर भटकता रहे
एक रहस्‍मय रिक्‍तता
का बोध होता रहे
तो इसे क्‍या कहें
किसी के लिए प्रेम
या संसार में होने का अनोखा रहस्‍य
किसी के लिए प्रतीक्षा
या संसार-विछोह का रहस्‍यंभावी दुख



9 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. तो इसे क्या कहें
    किसी के लिए प्रेम
    --------------------
    थोड़ा रहस्मयी होते हुए भी वाकई एक दिलकश और शानदार रचना ...

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  3. बाहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.

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  4. बाहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.

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  5. सुन्दर शब्द विन्यास |गहन भाव लिए अभिव्यक्ति |
    आशा

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  6. प्रेम सौन्दर्य की हर रूप में प्रियतम की स्मृति करा देता है।

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  7. सबके अपने अपने जद्दोज़हद..... सुंदर कविता

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  8. प्रिय और प्रकृति दोनों का संग अपना-अपना महत्व रखते हैं और दोनों ही सुख देने वाले... बहुत सुन्दर भाव

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  9. प्रेम की अवस्था ही कुछ ऐसी होती है
    बहुत खूब, सुन्दर रचना ...

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