Saturday, February 16, 2013

चन्‍द्र निशा


चन्‍द्र निशा

अम्‍बर को एक रंग से
परिभाष नहीं कर पा रहा हूँ
चन्‍द्र सितारों को देखकर
स्‍वयं को सतत् शांतिमय
निर्मल कर रहा हूँ
चन्‍द्रप्रभा मेरी घुटन, कुढ़न
विसंगत हृदय को
असंसार कर गई
सितारों की टिमटिम झिलझिम
मुझे भौतिकता से पार ले गई
रात्रि का सुस्थिर प्रशांत स्‍वर्गमयी मौसम
चन्‍द्राभा रजनी का गूढ़ समागम
मेरी मरणासन्‍न अन्‍तर्दशा को
अपनी धवल-उज्‍ज्‍वल छवि से
साकार करता है
प्राणामृत दे मुझे
एक नव-संसार रचता है
मैं आह्लादित हो प्रेम बयार से
प्रेम करता हूँ नवास्त्वि अवतार से
समग्र सितारे जैसे मेरे मित्र बन गए
मैं लगता जैसे चन्‍द्रमा हो गया
हे ईश्‍वर
एक रात्रि का ये स्‍वप्‍न दिखा दे
कि यह चन्‍द्रप्रकाश अनन्‍त हो जाए
कि ये सितारे मेरे निकट सो जाएं
मैं चन्‍द्र उजाला बन
सर्वत्र व्‍याप्‍त हो जाऊँ
प्रत्‍येक बार नेत्र खोलने पर
स्‍वयं को चन्‍द्रमा
और संसार को
चन्‍द्रप्रकाश पाऊँ

16 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | आभार

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  2. ये केवल कल्पना ही नहीं वरन तीव्रतर कामना है . अति सुन्दर..

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.आपका ब्लॉग भी ब्लॉग कलश पर जुड़ चुला है.पधारें.
    "ब्लॉग कलश"

    ReplyDelete
  4. सुंदर और प्रभावी ..

    बधाई !

    ReplyDelete
  5. सुन्दर कल्पना ... चन्द्र हो के जग को प्रकाशित करना ... बहुत खूब ...

    ReplyDelete
  6. कोमल स्वप्निल कल्पना ।

    ReplyDelete
  7. यह आलौकिक झिलमिलाहट मन को सुख देती है।

    ReplyDelete
  8. मैं लगता जैसे चंद्रमा हो गया... बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति!!

    ReplyDelete
  9. मैं लगता जैसे चंद्रमा हो गया... बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति!!

    ReplyDelete
  10. मैं चन्‍द्र उजाला बन
    सर्वत्र व्‍याप्‍त हो जाऊँ
    प्रत्‍येक बार नेत्र खोलने पर
    स्‍वयं को चन्‍द्रमा
    और संसार को
    चन्‍द्रप्रकाश पाऊँ

    ....वाह! बहुत सशक्त अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  11. हे ईश्‍वर
    एक रात्रि का ये स्‍वप्‍न दिखा दे
    कि यह चन्‍द्रप्रकाश अनन्‍त हो जाए
    कि ये सितारे मेरे निकट सो जाएं
    मैं चन्‍द्र उजाला बन
    सर्वत्र व्‍याप्‍त हो जाऊँ
    प्रत्‍येक बार नेत्र खोलने पर
    स्‍वयं को चन्‍द्रमा
    और संसार को
    चन्‍द्रप्रकाश पाऊँ

    बहुत सुन्दर मनोरम प्रार्थना में बिम्ब एवं रूपक तत्व लिए

    कृपया हृदय कर लें -

    चन्‍द्रप्रभा मेरी घुटन, कुढ़न
    विसंगत ह्रदय को
    असंसार कर गई

    ReplyDelete
  12. अहा...सुन्दर!!!
    परीकथा जैसी कल्पना....

    अनु

    ReplyDelete
  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (09-05-2013) ग्रीष्म ऋतु का प्रकोप शुरू ( चर्चा - 1239 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  14. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

    ReplyDelete
  15. बड़ी काव्यमयी कोमल सी कल्पना ! कविता में निहित निर्मल शान्ति मन को सराबोर कर गयी ! बहुत सुंदर रचना !

    ReplyDelete