Thursday, February 14, 2013

नागरिकता वर्गीकरण


पार्क में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर बासंती आगमन में शिशिर हवा का सेवन कर रहा था। नीला आकाश हरे पेड़ों की ओट से शरीर और मन दोनों को तन्‍दुरस्‍त कर रहा था। प्रकृति के नजारों से अभिभूत होने में मग्‍न था कि विसंगतियों का दर्शन आंखों के समक्ष आने-जाने लगा। एक व्‍यक्ति तेज-तेज चलता हुआ गुटखा खाते हुए वहां से निकल गया। गुटखे का प्‍लास्टिक पैकेट उसने पार्क में उड़ा दिया। ठीक उसी समय पार्क में एक व्‍यक्ति तिपहिया रेहड़ा लेकर पिछले दिन-रात के गंद को उसमें एकत्रित कर रहा था। एक अन्‍य व्‍यक्ति धू्म्रपान कर रहा था। सरकारी स्‍कूलों के लड़के मां-बहनों को अपनी अभद्र टिप्‍पणियों से अपमानित कर रहे थे। कहने को एक नहीं अनेकों विसंगतियों से सुबह के शिशिरमय वातावरण का दम घुट रहा था।

    इसी समय दिमाग में आया कि क्‍यों नहीं भारतीय शासन व्‍यक्ति-व्‍यक्ति के अच्‍छे-बुरे कामों के अनुरुप नागरिकता का वर्गीकरण कर दे। जो अच्‍छे काम करें वो प्रथम और विशिष्‍ट नागरिक त‍था जो गन्‍दे असभ्‍य व्‍यवहार करें वे द्वितीय नागरिक। इस द्वितीय श्रेणी में उन सभी को रखा जाए जो गुटखा, तम्‍बाकू, धूम्रपान, मदिरापान करते हों। इसमें उन सभी व्‍यक्तियों को सम्मिलित किया जाए जो स्‍थापित शासकीय मूल्‍यों का अनादर करें, सार्वजनिक स्‍थानों पर नितान्‍त निजी गतिविधियों का असभ्‍य प्रदर्शन करें।

    प्रथम एवं विशिष्‍ट नागरिक को शासन सभी जीवनोचित सुविधाएं उपलब्‍ध कराए। उन्‍हें द्वितीय घोषित नागरिकों से अधिक अधिकार दिए जाएं, जिनका वे सामाजिक हित में निसंकोच और निडरता से प्रयोग करें। द्वितीय नागरिकों द्वारा उनके विरुद्ध उत्‍पन्‍न हो सकनेवाले अमानवीय व्‍यवहार की आकांक्षा को ध्‍यान में रखते हुए, उन्‍हें शासकीय सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। यदि वे द्वितीय नागरिक के किसी दुराचार का दमन करने के लिए अपनी शारीरिक शक्ति से उसको कठोर दण्‍ड देते हैं तो ऐसी स्थिति में विधि के प्रावधान इतने लचीले हों कि प्रथम नागरिक के विशिष्‍ट अधिकारों की ससम्‍मान संरक्षा हो सके। ऐसी स्थिति में यह नहीं होना चाहिए कि दुराचारी के प्रभाव में प्रथम नागरिक को कानूनी प्रताड़ना झेलनी पड़े।

    इन सबके अतिरिक्‍त समय-समय पर प्रथम एवं द्वितीय नागरिक पहचान कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। ऐसे कार्यक्रमों में नागरिकों का वर्गीकरण करनेवाले अधिकारी मानवीयता और सामाजिकता के पक्षधर तो हों ही, साथ ही उनका नैतिक और मौलिक विवेक भी उच्‍च स्‍तरीय होना चाहिए। यदि वे नागरिक वर्गीकरण की क्षमता विशिष्‍टताओं से परिपूर्ण हों और उनके स्‍थायी रुप से ऐसे बने रहने के सार्वजनिक संकेत मिलते हों तो उन्‍हें वर्गीकृत किए गए नागरिकों को स्‍वतंत्र रुप से शासित करने का विशेषाधिकार भी हो। इससे उनको प्रथम एवं द्वितीय नागरिकों को उनके अच्‍छे-बुरे व्‍यक्तिगत निष्‍पादन पर त्‍वरित सम्‍मान देने व दण्डित करने का अवसर प्राप्‍त होगा।

    प्रथम नागरिकों को सुविधाएं, सम्‍मान और विशेषाधिकार मिलते देख स्‍वाभाविक रुप से द्वितीय नागरिकों में एक अच्‍छा संदेश प्रसारित होगा, और यदि उनमें अच्‍छे बन कर सुविधा, सम्‍मान, विशेषाधिकारों को प्राप्‍त करने की उत्‍कंठा होगी तो उसी क्षण बुराई पर अच्‍छाई की विजय का सतत् मार्ग प्रशस्‍त हो जाएगा।

    मैं पार्क के चहुंओर व्‍याप्‍त विसंगतियों से पुन: एकाकार हुआ, जब उपरोक्‍त विचार-उद्वेलन से बाहर आया। मैंने सोचा कि यह धारणा केवल मेरे अकेले की तो हो नहीं सकती। जब भी, जिसका भी ऐसी विसंगत सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों से सामना हुआ होगा, उसने इनसे बचने के उपाय के रुप में ऐसी धारणाएं बनाईं होंगी। परन्‍तु मात्र धारणाएं बनाने से क्‍या होगा। यदि ये व्‍यावहारिक नहीं बन पाईं तो सब व्‍यर्थ है। पुन: मैंने सोचा कि मुझसे पूर्व न जाने कितने लोगों ने ऐसा उपकारी विचार प्रस्‍तुत किया हो, परन्‍तु जब तक शासन-सत्‍ता द्वारा इसे व्यवहृत नहीं बनाया जाएगा तब तक कुछ नहीं हो सकेगा। प्रथम और द्वितीय नागरिक का विचार जिन विसंगतियों के कारण मेरे मस्तिष्‍क में आया, क्‍या वे शासकीय विचरण के लिए सहयोगी नहीं हैं? यदि धू्म्र व मद्यपान, गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, इत्‍यादि मदांध करनेवाले उत्‍पादों का कारोबार समाज में चल रहा है तो किसकी अनुमति से? शासन-सत्‍ता की अनुमति से ही और उनके लिए ही ना, तो तब वह इन पर रोक क्‍यों और किसके लिए लगाएगी। उसे अच्‍छे, सभ्‍य नागरिकों से अधिक चिंता असभ्‍य, अमानवीय नागरिकों की है। इसलिए देश में प्रथम एवं द्वितीय नागरिक वर्गीकरण के अपने विचार को मैंने पार्क के किसी कोने में दबा दिया और विसंगतियों से प्रताड़ित होता हुआ घर चला गया।

5 comments:

  1. बड़ी घूस चलेगी तब..योग्य को कहाँ कभी कुछ मिलता है?

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  2. अच्छी सोच है ...
    पर शायद ऐसा कर पाना संभव न हो ...
    विदेशों में देखिये सड़कों पर एक तिनका तक नहीं मिलता कचरे का ....

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  3. बहुत मुश्किल है ऐसा संभव होना इसलिए उन ख्यालों को आप वहीँ दफ़न कर आए अच्छा किया.
    लेकिन ...संभव होता तो बहुत अच्छा होता .

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