महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, February 13, 2013

उसे प्रतीक्षा थी मेरे विद्वान बनने की


मैं पारिभाषिक सांसारिक जटिलताओं
को नहीं, बल्कि आत्‍मसात् की हुईं
जगत विषमताओं को
अपने लिए अभेद्य समझता
प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष स्‍थायी-अस्‍थायी
रुप से छन-छन कर आती
विसंगतियों को अपनी
कमजोरी बनाता उन्‍हें बढ़ाता
क्‍या जानता था कि
एक समय एक विश्‍वाससम्‍पूर्ण छवि
मेरी प्रेरणा बनेगी
एक अदम्‍य साहसी, विराट ह्रदय मानसी
मेरी संजीवनी बनेगी
पर ऐसा होने पर भी
मैं उसके और अपने लिए
द्विअर्थी बना रहा
इससे मुझे स्‍वयं धोखा हुआ
अपने लिए जन्‍मी संवेदना को
मैंने संदेहास्‍पद समझा
मैं हमेशा गलत हुआ
सब लुटने पर
इस बात पर उलझा
मेरी छोटी बहिनें मेरी
बाल्‍य-सी लगनेवाली आदतों को
देख कर कहतीं
कि मुझे सबसे छोटा होना चाहिए था
पर उनके कहे गए वाक्‍यों से
मैं अपने अन्‍दर किंचमात्र भी
अव्‍यवस्‍था महसूस नहीं करता था
उलट उनके ऐसे कहे जाने को
मैं अच्‍छा मानता
और कामना करता कि
वे दोबारा, बारम्‍बार निरन्‍तर ऐसा बोलें
ताकि मैं बचपना महसूस करुं
बाल-हृदय अपनाऊं
सभी सांसारिक विसंगतियों से अनभिज्ञ हो जाऊं
लेकिन इस मेरे बालपने के समान
मुझे कोई अपना साथ न मिला
मेरे संग-सम्‍मेलनवाले सभी प्राण
बेअन्‍त विद्व होते
और इस प्रसंग में
वे अपने विद्वत तरीके से
मुझे प्रेम करते
तो बालपन की मानसिकता से आरुढ़
मैं ठगा-सा नासमझ रहता
अपने लिए किसी के ऐसे
प्रेम-बलिदान को मैं
अनापेक्षित समझता
ऐसे प्रेमी-जन के लिए
यदि कोई मुझे भड़काता
तो मैं एकदम बुद्धू की तरह
सब कुछ स्‍वीकार करता
अपने स्‍नेही-प्राण को तिरस्‍कृत
और घृणास्‍पद दृष्टि से देखने लगता
अंतत: मैं एकान्‍तवास के सहारे
जब अपनी बुद्धि का कहा मानता
अपनी आत्‍मा की आहें अनुभव करता
तो अपने प्रेमीजन की यादों में
मेरी जान जाती सी
मुझे लगती
मेरी सांस ऊपर उठने से पहले
अपने को दबाने लगती
कि किसलिए ऊपर जाना
तेरा तो अब कोई नहीं है
साथ निभानेवाला
पर मैं अपनी बहनों द्वारा
मेरे लिए आभाषित
बुद्धू और बालपन के अंलकारों से
अपने लिए आधार ढूंढता
कि मैंने यदि मुझे प्‍यार करनेवाले को
गलत समझा तो केवल
अपनी बाल्‍य समझ से
जिसमें मैं एक निपट अविवेकी था
और अपनी क्षमा के लिए
मैंने अपने प्रेमी के समक्ष
मेरी बहनों की
मेरे बाबत कही गई
उक्‍त उक्ति प्रस्‍तुत की
प्रेमी को भी
मेरी परिस्थिति ज्ञात थी
वह जानकार तो था ही
विद्वान तो था ही
उसे प्रतीक्षा थी
प्रेम शब्‍द को समझने के लिए
केवल मेरे विद्वान बनने की।

14 comments:

  1. बहुत अच्छा विचार पनपाया था आपने अपने मानुष पटल पर ...............

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  2. वैचारिक....प्रवाहमयी कविता

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  3. बहुत खूब ... भावमय रचना ...

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  4. संबंधों को समझने में जीवन निकल जाते हैं, हम विद्वान बनकर भी ठगे से रह जाते हैं।

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  5. बच्चा मन तो हर इंसान के अन्दर होता है परन्तु कुछ उसे समय से पहले खत्म कर देते हैं और कुछ उसे जीवन भर साथ लिए चलते हैं | मैं स्वयं विद्वान होने की प्रतीक्षा अपने खुद के लिए कर रहा हूँ | मुझे तो लगता है बड़ा होना या विद्वान् होना इन दोनों से बेहतर है बच्चा बन कर जीवन व्यतीत करना | क्योंकि सिर्फ वही ह्रदय निष्पक्ष,निश्चल और प्रेममय रह सकता है बड़े होने पर या विद्वान् होने पर तो कठिनाइयाँ बढती ही जाती है और उनके साथ साथ बचपना भी मृत्यु की ओर चला जाता है |

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  6. गहरी बात!
    जीवन की पुश्ती में इतने सफे हैं
    कितना भी पढ़ लें अपढ़ ही रहेंगे

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  7. बहुत ही सुन्दर शब्द


    सुनिधि

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  8. कुछ बनने की चाह में कितना कुछ हाथ से छूट जाता है...बहुत गहन भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

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  9. संबंधों का यही अहसास जीवन भर जोड़े रखता है एक दूसरे को
    विचारों की गहन अनुभूति
    बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    आग्रह है इसको भी पढें
    कहाँ खड़ा है आज का मजदूर------?

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  10. बालपन में प्रेम की समझ-नासमझ की स्थिति .....
    बहुत ही सुन्दर, भावपूर्ण

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  11. ऐसे प्रेमी-जन के लिए
    यदि कोई मुझे भड़काता
    तो मैं एकदम बुद्धू की तरह
    सब कुछ स्‍वीकार करता
    अपने अन्दर के मनोभावों को बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया आपने ...

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  12. मानसिक कुहांसे को शब्द देती सकारात्मक सोच की सशक्त अभिव्यक्ति आखिर तक बांधे रहती है .शब्दश :.शुक्रिया आपकी टिपण्णी का बल्लभ डोभाल जी की रचना लिए वह अंक हाथ आया ,ज़रूर अनुशीलन करूंगा .शुक्रिया .

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  13. बहुत सुन्दर कविता विकेश भाई

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  14. ये तो मैंने पहले भी पढ़ चुका था :)

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