Saturday, February 2, 2013

मृत-अमृत

कभी-कभी लगता है / कि यह संसार सपना है / रात को कभी देखता हूं / तो लगता है सब मृत हैं / तब यह कैसे हो सकता है / कि आकाश अमृत है / वह भी तभी तक जीवित है / जब तक मैं उसे देख पा रहा हूं / धरती को कब उपस्थित रहना है सदा प्राणियों के लिए / वह भी तभी तक है / जब तक किसी की सांसों में दम है / जैसे ही किसी की / अन्तिम सांस भी उखड़ी / मानो सब कुछ उजड़ गया / पर किस के साथ समय ऐसा है / जो वास्‍तविकता बतलाए / सभी तो ऐसे हैं मग्‍न / जैसे वे हमेशा ऐसे ही रहेंगे / मौसम बदलेगा, आयु बढ़ेगी मिटने के लिए / साथ कौन है किसी के, सदा चलने के लिए / और एक दिन अचानक / विक्रम सांसें जब ऐसे फूलेंगी / कि छाती फट पड़ने को तैयार हो / तब थकावट होगी / और विराम लग जाएगा भावों, भावनाओं पर / अन्‍त में / सिर्फ कुछ याद करने का प्रयास रह जाएगा / पनीली आंखों में / वे भी ज्ञान दे जाएंगी / प्राणी की अन्तिम इच्‍छा का / खुली रहीं तो मृत्‍यु कठिन लगी / और बन्‍द हैं / तो एक और गहरी पीड़ा को / हंस के सह लिया। 
मृत-अमृत रहस्‍य


8 comments:

  1. नींद मृत्यु और जगना जीवन का परिचायक है..

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  2. यही तो जीवन है |उम्दा सोच
    आशा

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  3. मृत-अमृत के बीच ही जीवन भी है.

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  4. काश, सभी यह समझ पायें...बहुत गहन अभिव्यक्ति..

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  5. प्रकाश ओर अन्धकार ... जीवन ओर जीवन की माया ... कुछ तो भ्रम रहता ही है श्रृष्टि भी तो रहस्य ही है ...

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  6. अनंत की खोज को बेचैन मन

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  7. अलका गुप्ताMarch 18, 2013 at 10:24 AM

    अनंत की खोज को बेचैन मन

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