Sunday, January 13, 2013

पत्रिका समीक्षा




पत्रिका समीक्षा
आधारशिला अंक जून-अगस्‍त, २०१२   मूल्‍य : रु. ५०
संपादक-दिवाकर भट्ट
संपादकीय कार्यालय
बड़ी मुखानी, हल्‍द्वानी-२६३१३९, नैनीताल (उत्‍तराखण्‍ड)
फोन : ०९४१०५५२८२८

आधारशिला पत्रिका जून-अगस्‍त २०१२ अंक समर्पित है बल्‍लभ डोभाल को। लेखक के बारे में लिखने, उसे समझने और उसके कृतित्‍व के सकारात्‍मक सामाजिक भावों को प्रसारित करने के लिए लेखक के साहित्‍य के सम्‍पूर्ण वाड.मय से परिचित होने की आवश्‍यकता है। चूंकि उपन्‍यास, कहानी, कविता, संस्‍मरण, रिपोर्ताज, एकांकी, बाल कहानियों और गम्‍भीर धर्म-चिंतन के रुप में बल्‍लभ डोभाल का साहित्‍य सृजन विपुल है, अतएव इन सबके समग्र प्रकटीकरण में आधारशिला का यह प्रयास उतना स्‍तरीय नहीं है, जितना हो सकता था। फिर भी इस संकलन में लेखक के प्रतिष्ठित समर्थकों के विचारों से एकाकार होने का अवसर तो प्राप्‍त होता ही है। इन विचार दृष्टियों में बल्‍लभ डोभाल की लेखकीय प्रतिष्‍ठा निश्चित ही अत्‍यन्‍त ऊंची अनुभव होती है। कह सकते हैं कि डोभाल को पढ़नेवालों का दृष्टिकोण बदलने में उनका साहित्‍य-सृजन बहुत सहायक रहा है।
     किसी अच्‍छे साहित्‍यकार को समुचित शासकीय सम्‍मान न मिलना, यह व्‍यवस्‍थागत दोष हो सकता है। तथापि इसके विपरीत बड़ी बात यह है कि आम जनता का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला शासन-तन्‍त्र भले ही ऐसे लेखकीय कौशल की अनदेखी करे परन्‍तु आम जनता अर्थात् जनता-जनार्दन ही वह पाठक-वर्ग भी है, जो लेखक के रचनाकर्म से स्‍वयं के व्‍यक्तित्‍व में एक जीवनात्‍मक परिवर्तन लाती है। सच्‍चे लेखक के लिए वास्‍तविक सम्‍मान, उसके सृजन का प्रतिलाभ यही है। बल्‍लभ डोभाल का रचना-संसार कालखण्‍ड विशेष तक ही सीमित नहीं है। उनकी चिंतन की नई दिशाएं नामक पुस्‍तक हिन्‍द-विस्‍तार की मौलिकता और नैतिकता के सन्‍दर्भ में एक कालजयी चिंतन कोष है। इसके अध्‍ययन से एक सच्‍चा हिन्‍दुस्‍थानी अपनी विस्‍मृत जड़ों की ओर आत्मिक रुप से अग्रसर होता है। आधारशिला पत्रिका में इसका उल्‍लेख निश्चित ही प्रशंसनीय है। लेखक के रचना-कर्म के एक-एक संग्रह का उल्‍लेख करना उतना आवश्‍यक नहीं जान पड़ता, जितना कि उनको उस लक्ष्‍य के साहित्‍य-रत्‍न के रुप में सीधे परिभाषित करना, जिसके सान्निध्‍य में आकर हरेक व्‍यक्ति सज्‍जनतापूर्वक सोचने-‍विचारने लगता है। लेखक होने का तात्‍पर्य सर्वप्रथम सज्‍जनता को प्राप्‍त होने से है और इसमें डोभाल अग्रणी हैं। किसी भी लेखक और उसके लेखन की सामाजिक महत्‍ता तब ही आकार लेती है अर्थात् अपना प्रभाव छोड़ती है, जब लिखनेवाला ईमानदार हो तथा उसके द्वारा सृजित साहित्‍य लोक-भावना के अनुरुप हो। आशा है कि बल्‍लभ डोभाल के विस्‍तृत साहित्यिक-संसार को कभी न कभी एक ऐसा माध्‍यम अवश्‍य प्राप्‍त होगा, जो उसे समग्रता से प्रस्‍तुत कर सके। इस कार्य हेतु आधारशिला पत्रिका का योगदान एक महत्‍वपूर्ण शुरुआत भर है।

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