महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, January 6, 2013

प्रभाव-क्षमता की सीमा



किसी भी व्‍यक्ति, प्रकृत दृश्‍य, घटना-दुर्घटना से हमारी प्रभावित होने की क्षमता का प्रश्‍न है। ये विचार इसलिए कौंधा क्‍योंकि अचानक जीवन का अर्थ मेरी दृष्टि में चारों ओर से सिमटकर एक सघन व्‍यर्थता में बदल गया है। जैसे-जैसे समय का विस्‍तार हो रहा है, मेरी वैचारिकता में खोखलाहट घर करती जा रही है। लगने लगा है कि मुझ सहित सम्‍पूर्ण मानु‍षिक परिवेश क्‍यों और किसलिए है? जब हमें अपनी तुष्टि और स्‍वार्थी प्रवृत्ति के अतिरिक्‍त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता तो मनुष्‍यरुपेण हमारी मान्‍यता किसलिए? इसका क्‍या औचित्‍य? ईश्‍वर, सन्‍त, महात्‍मा, महानुभवों, बुदि्धजीवियों से हम आप सब लोग मात्र अध्‍ययन शिक्षण के लिए प्रभावित होते हैं। उन जैसा बन जाने की संकल्‍पशक्ति हममें आ ही नहीं पाती। प्राकृतिक व्‍यवस्‍था और प्रकृति हमारी कहानी, कविता, चित्रकारी, अनुसन्‍धान और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं की तुष्टि हेतु उपस्थित हो पाती है। हम प्रकृति से प्रकृति जैसा बनने की प्रभाविता को जीवनपर्यन्‍त स्थिर नहीं रख पाते। बल्कि वास्‍तविक जीवन में हमने प्रकृति को नष्‍ट करने के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य कार्य नहीं किया। इसी प्रकार सामाजिक घटनाएं-दुर्घटनाएं तथा दैवीय और प्राकृतिक आपदाएं भी हमें तब तक ही संवेदना के केन्‍द्र में रख पाती हैं, जब तक इनका आत्‍मप्रभाव विद्यमान रहता है। आत्‍मप्रभाव हमारे जीवन का सुचारु विचार नहीं बन पाता। हमारी चेतना और इन्द्रियां अधिक समय तक सभ्‍यता, सादगी, सदाचार, सद्बुदि्ध, सद्भावना से रहने में बेचैनी महसूस करने लगती हैं। हमारा परोपकारी भाव और सदाशयता का विचार स्‍वयं के संकल्‍प से नहीं अपितु भीड़ के प्रवाह से उद्वेलित होता आया है। तभी तो किसी अच्‍छे-बुरे अनुभव और घटना से प्रभावित होने की हमारी क्षमता एक सार्थक सामाजिक लक्ष्‍य तक पहुंचे बिना ही मरणासन्‍न हो जाती है। अन्‍त में हम पुन: दैनंदिन की उलझनों में फंस जाते हैं।

      दिल्‍ली में दुष्‍कर्म के बाद अधमरी और बाद में राजनीतिक निर्णयों के कारण मृत्‍युप्राप्‍त युवती ने सोई हुई सामूहिक चेतना को जगाया तो एक पखवाड़े तक पूंजीवाद के राजकाज की संभावनाओं पर एक बड़ा कुठाराघात हुआ। युवती के लिए न्‍याय और समाज के लिए सुधार की मांग करते लोगों की आवाज में अब ठहराव आ गया है। उत्‍पीड़ित युवती के मित्र ने दुर्घटनावाली रात का जो रोंगटे उघाड़नेवाला वर्णन किया, उससे हमारी लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था और लोक सभ्‍यता की सच्‍चाई दु:खद रुप से सामने आती है। इस बीच १६ दिसंबर, १२ से अब तक बलात्‍कार पीड़ित महिलाओं के समाचारों का लगभग प्रतिदिन विस्‍फोट हो रहा है। राष्‍ट्र को सुसंगत व्‍यवस्‍था देने के लिए अधिकृत महानुभावों की निश्‍चेष्‍टा में प्रतिपल वृदि्धी हो रही है। उन्‍होंने क्रान्ति का कारण बनी दिल्‍ली बलात्‍कार की दुर्घटना को भी उसी कानूनी प्रक्रिया से निपटाने की जुगत लगाई है, जिससे वह साधारण कहासुनी के मामल निपटाती है। तब इस घटना से सत्‍ताधारियों पर क्‍या प्रभाव पड़ा? शायद कुछ नहीं। जनशक्ति भी प्रभावित करनेवाली अपनी क्षमता से चूकती प्रतीत हो रही है।

      ऐसे में कुछ व्‍यक्ति आप और हमसे निकलकर स्‍वयं को मानवता का पर्याय तो बना ही चुके हैं। कम से कम इनसे तो कुछ सीख ली जा सकती है। बलात्‍कारियों को शीघ्रातिशीघ्र मृत्‍युदण्‍ड देने के लिए कानूनी समीक्षा और संशोधन को लेकर पिछले १४ दिनों से अनशन कर रहे बरेली के राजेश गंगवार, पिछले ८ दिन से अनशन कर रहे बाबू सिंह जैसी भावनाएं हरेक भारतीय की क्‍यूं नहीं हैं? हो सकता है कि राजनेताओं, शिविरबद्ध प्रबुद्ध वर्ग के साथ-साथ कई लोगों के लिए यह मूर्खता हो! लेकिन मानवीयता का उद्भाव इन्‍हीं व्‍यक्तियों ने दर्शाया है। शीत प्रकोप से इनके स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है और प्रतिदिन शीत वृदि्धी हो रही है। कुछ प्रदर्शनकारी अनशनस्‍थल पर मोमबत्तियां जलाकर जरुर इनका मान बढ़ा रहे हैं, परन्‍तु सरकारी चिंता में ये स्थिति कहीं नहीं है।

पानी की बौछारें झेलनेवाला और पुलिस की लाठियां खानेवाला जनसमुदाय क्‍या मात्र भीड़ बढ़ाने के लिए जुटा था? क्‍या उस भीड़ की भावनाएं पन्‍द्रह दिनों में ही मर गईं हैं? या यह भीड़ सत्‍ता के पालकों ने घोटालों से ध्‍यान हटाने के लिए सुनियोजित तरीके से जुटाई थी? या हर क्रान्ति का लक्ष्‍यविहीन रह जाने का कारण हम सब की प्रभाव-क्षमता की सीमा है।

1 comment:

  1. शुक्रिया विकेश भाई उत्साह बढाने का .ॐ शान्ति .चार दिनी सेमीनार में ४ -७ जुलाई ,२ ० १ ३ ,अल्बानी (न्युयोर्क )में हूँ .ॐ शान्ति .




    बेहद सटीक अर्थ पूर्ण प्रासंगिक प्रश्न उठाती है आपकी पोस्ट .सत्ता माया रावण को ऐसे ही रहना है संग का रंग चढ़ता है चर्च के एजेंटों का चढ़ रहा है अव पतन तो होना ही है बदलाव चाहता है अब ये मुर्दा भारत .ॐ शान्ति .अच्छे लोगों का संग साथ चाहता है हर कोई .ॐ शान्ति .

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards