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Friday, January 4, 2013

कानून के मायने



भारत और दुनिया के सभी चिंतकों, विचारकों, विश्‍लेषणकर्ताओं ने बलात्‍कार के कारणों की सघन पड़ताल कर ली है। उन्‍होंने अपने मस्तिष्‍कीय प्राचलों को सघनता से मथते हुए निर्णय लिया है कि बलात्‍कार करने की प्रवृत्ति एक बीमारी, कुंठा है। उनके निरन्‍तर आते विचार प्रवाह में मीडिया भी सम्मिलित है। इसने भी दुष्‍कर्मियों को आपराधिक वृत्तिवाला बताने के समाचार प्रकाशित कर दिए हैं। बहुत से विचार, प्रवचन, उपाय, विधियां अनेक चिंतकों के मस्तिष्‍क से निकलकर शोधकार्य हेतु प्रयोग हो रही हैं। बलात्‍सहवासियों को जानने के लिए राष्‍ट्रीय अंतर्राष्‍ट्रीय विमर्श हो रहे हैं, होंगे और अन्‍त में किसी नई दुर्घटना के अस्तित्‍व में आने के बाद दुष्‍कर्मियों को कड़ी सजावाला कानून और इसे हेतु होनेवाले समस्‍त अभ्‍यास, नीतियां, कार्यक्रलाप और इनका क्रियान्‍वयन ठप हो जाएगा। धीरे-धीरे दुष्‍कर्म पीड़ितों का दु:, जनाक्रोश की हवा, सरकारी नीति, अंतर्राष्‍ट्रीय ह‍स्‍तक्षेप समय की असीम गहराई में समकार इतिहास बन जाएंगे और हम सब समस्‍याओं के निराकरण में मिली असफलताओं से दुखित होकर वापस कुंठाओं में जीने लगेंगे।
    यह आकलन कोरी कल्‍पना के आधार पर नहीं है। यह अनुभव मैंने रामलीला मैदान में जनलोकपाल की मांग की क्रान्ति से लेकर अब तक किया है। पिछले वर्ष अण्‍णा नेतृ‍त्‍व में रामलीला मैदान से जनलोकपाल के लिए देश-दुनिया में जो एक-दो महीने का क्रान्तिकारी उबाल आया था वह शनै:-शनै: समय की मार सहता हुआ बैठ गया। क्‍यों‍कर हम हर बार उस शासन-सत्‍ता से आशा करते हैं, जो हर बार दुर्घटना की दिलाशा के नाम पर कई विश्‍वासघात कर चुकने का दोषी रह चुका है।
    सरकार कानून बना रही है। द्रुत कार्यकारण न्‍यायालय बनेंगे। धारा, साक्ष्‍य, रिपोर्ट, जांच, सुनवाई, निर्णय.....और इनमें लगनेवाला समय इतना व्‍यतीत हो चुका होगा कि लोग गुलाबी क्रान्ति की लाल आग को भूल चुके होंगे। कई लोगों को मारनेवाले और कई लोगों द्वारा मारते हुए प्रत्‍यक्ष देखे जाने के बाद भी धारा, साक्ष्‍य, रिपोर्ट, जांच, सुनवाई, निर्णय...होते-होते आतंकी को मृत्‍युदण्‍ड मिलने में चार वर्ष व्‍यतीत हो गए। कब समझेंगे कानूनची कि जीवन कितना है! साठ वर्ष की औसत आयुवाला मानुषिक जीवन यदि ४,, १६ वर्ष न्‍याय मिलने की प्रतीक्षा में व्‍यतीत होगा, तो न्‍यायिक प्रक्रियाओं से कुढ़न होना स्‍वा‍भाविक है। कानून...इस शब्‍द के व्‍याख्‍याता और पालनकर्ता यदि आम आदमी बनकर जीवन व्‍यतीत करें तो ज्ञात होगा कि इसकी उपयोगिता, प्रासंगिकता कितनी छिछली और निरर्थक हो चुकी है। एकांत में, राह चलते मनुष्‍य के लिए कानून कहां होता है। किसी के साथ दुर्घटना, लूट, अनहोनी होने के बाद कानूनी प्रक्रियाओं का क्‍या औचित्‍य? यह तब सार्थक होता जब इससे सुरक्षा होती, जब इससे रक्षाबोध होता। अंग्रेजी राज से मुक्‍त हुए हमें आज ६७ वर्ष व्‍यतीत हो चुके हैं। यदि कर्ताधर्ताओं को आम आदमी की इतनी चिंता होती तो क्‍या हर दुर्घटना, देशद्रोह के बाद त्‍वरित कानूनी समीक्षा नहीं होती। बलात्‍कार आज ही नहीं हुआ। यदि देश चलानेवाले पहला बलात्‍कार होते ही आज जैसी चिंतनीय अवस्‍था में होते तो स्थिति कुछ और ही होती! क्‍या जनक्रान्ति के स्‍वर से डरकर ही सरकार कानूनों की परिस्थितिजन्‍य समीक्षा करेगी? क्‍या यह उसका स्‍वयं का कर्तव्‍य नहीं है कि वह हर सामाजिक बुराई के उन्‍मूलन के लिए स्‍वयं ही तत्‍काल डट जाए? यदि सरकार को छोटे बच्‍चे की तरह हांककर ये कर वो कर बताने की स्थिति हमेशा बनी रहेगी, तो तब वे हैं ही क्‍यों?
        एक मनुष्‍य को यदि मनुष्‍यता का अनुभव हो, उसे समाज, सरकार का अहसास हो तो इसका कोई तो सुरक्षित आधार होना चाहिए। किसी को राह चलते यदि अपनी संरक्षा पर हमेशा सन्‍देह बना रहे तो उसके मौलिक अधिकारों की किस नैतिकता के बूते रक्षा हो रही है। ऐसे में मनुष्‍य अपना पारिवारिक, सामाजिक, राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य पूरा करे या डर और संशय में जीवन गुजारे...?  ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं, जो राष्‍ट्रीय नेताओं के मस्तिष्‍क में स्‍वयं आने चाहिए। कोई निर्दोष बेचारा/बेचारी कभी हत्‍या, कभी बलात्‍कार तो कभी किसी अन्‍य आपराधिक आक्रमण से जान गवां दे तो उसका तो सर्वस्‍व समाप्‍त। तब समाज में कानून रहे या जंगलीपना उसे इसका दोबारा आभास कभी नहीं होगा। ऐसे में समाज के कानून के मायने क्‍या हों!
शापित-शोषित हो चला प्रकृति का हर कण / एक विचित्र राह पर जीवन का विचरण / तनिक ठहर कर सोचें वे] जो हैं सत्‍तासीन / क्षणभंगुर जीवन स्थिति क्‍यों है दीनहीन?

6 comments:

  1. बेहद सार्थक लेखन...
    आभार

    अनु

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  2. आपका धन्‍यवाद।

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  3. बढ़िया विचार मंथन।

    भय बिन होत न प्रीत गुसाईं। यूं परिवेश -परवरिश -आनुवंशिक प्रवृत्ति भी कारक बनती है। लचर कानून बड़ी बड़ी बडबड़िया बातें कर सकता है भय पैदा नहीं कर सकता। बेशक जहां कानून सख्त हैं बलात -दुष्कर्म वहाँ भी है ,वयक्ति व्यक्ति से समजा बनता है व्यक्ति बदले तो नई सुरक्षित समाज व्यवस्था पनपे।

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  4. सच है वर्तमान हालातों को देखते हुए तो यही लगता है कि हमारे यहाँ कानून होना न होना एक ही बात है। तो फिर कानून व्यवस्था में सुधार की बात ही क्या जो हाल पहले थे वही आज भी है। न्याय के लिए कानून का दरवाज़ कटखटने वाला मरते मर जाता है मगर उसे इंसाफ नहीं मिल पाता। आपकी इस पोस्ट से crime petrol सिरियल का वो postman वाला एपिसोड याद आ गया।

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  5. बहुत सुन्दर अर्थ पूर्ण प्रासंगिक विश्लेषण प्रधान लेख , नया साल वर्ष भर आपको प्रफुल्लित रखें सृजन शील बनाये रहे।

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