Wednesday, January 23, 2013

अन्‍धेरों उजालों के बीच

अन्‍धेरों उजालों के बीच

आधी रात के बाद मैं नींद के साथ कबड्डी खेल रहा हूं। बिटिया के मुखमण्‍डल को देखकर जीवन के विविध रंग दिल, दिमाग, आत्‍मा और आंखों में उमड़-घुमड़ आए हैं। इस समय वह अपनी साढ़े चार वर्षीय चंचलता और नटखटपन से कोसों दूर निद्रालीन है।

देशकाल, संसार-समय की यथास्थिति पर कविता लिखने की सोचते-सोचते घंटे व्‍यतीत हो गए। कोई अनुभव मेरे विचार से सामंजस्‍य नहीं कर पाया। अधूरे शब्‍दों और रिक्‍त भावों से सजाकर एकाध बार कुछ लिखा, कुछ सोचा-विचारा पर सब कुछ जैसे सांसारिक यथास्थितिवाद से पीड़ित प्रतीत हो रहा है। कुछ भी ऐसा पृष्‍ठांकन नहीं हो पाया, जो स्‍वयं को संतुष्‍ट करता हो। 

आज की आत्‍मछिद्रित मानवीय हलचल में मैं तड़प कर मात्र भावशून्‍य ही हो पाया हूं। मेरी आत्‍मशक्ति का क्षरण ही तो हुआ है, इसीलिए मेरी स्थितियों-परिस्थितियों की समीक्षा दृष्टि को काठ मार गया है। लेखनी का जैसे दम घुट गया है। समाज की विद्रूप रुपरेखा पर लिखने के लिए किनारा नहीं मिल पा रहा है। सामाजिक दशा की तरह ही मैं भी स्‍वयं में गड्डमड्ड हो गया हूं। मेरा भी सुधारवाला छोर इस समय की मानुषिक राज की विचित्रता में उलझ गया है। 

अभी दोदम याद आया कि रेडियो पर बजनेवाला कोई गाना मेरी इस ऊटपटांग लेखन चाल में व्‍यवधान बन गया है। गीत के बोल से अधिक संगीत स्‍वर-लहरियों में मन उड़ान भरने लगा। अपनी सज्‍जनता पर अंशमात्र गर्व उभर आता है, क्‍योंकि मनहर संगीत स्‍वर-भावों में उड़ते-उड़ते मैंने संगीतकार के सृजन श्रम को भी याद कर लिया। बाहर आसमान हवाई जहाज की गड़गड़ाहट से थर्रा उठा है। हवाई जहाज की ध्‍वनि कम होते-होते शून्‍यविलीन हो गई है। अब मन लेकर पुंछ की भारत-पाकिस्‍तान सीमा पर पहुंच गया हूं। आपस में गुड़ी-मुड़ी छह फुट तारबाड़ और उसके आर गश्‍त कर रहे सैनिकों की तसवीर देखी थी कहीं। इस परिदृश्‍य पर ध्‍यान गूढ़ाया तो इसका उद्देश्‍य समझ न आया। वापस दिल्‍ली आया। दिल्‍ली की घटना पर सोचने से पूर्व मैंने एक चक्‍कर गांव में रह रहे अपने मां-पिता, बहनों, गांववालों से होते हुए देश-दुनिया के शहरों-गांवों के प्रत्‍येक मनुष्‍य की गति पर विचार करने पर लगाया। सबकी जिन्‍दगी पर दयाभाव बिखेर कर मैंने उनके स्‍वार्थ को प्रणाम किया। उनकी निरर्थक जीवनचर्या पर झुंझलाया।

यदि इन लोगों का स्‍वार्थ नहीं होता तो प्रतिक्रियावश....ब्रह्मांड, संसार, देश, विदेश, क्षेत्र, राज्‍य, भाषाएं, बोलियां, तेरा, मेरा, इसका, उसका, अच्‍छा, बुरा, गन्‍दा, सही, ऊंचा, नीचा, अमीर, गरीब, छोटा, बड़ा, इतिहास, वर्तमान, भविष्‍य, समय, असमय, जीवन, मृत्‍यु, इत्‍यादि....कुछ नहीं होता। जब स्वार्थ विद्यमान हुआ तब ही तो यह समग्र भाविक लाग-डाट संसार में प्रचलित हुई। इस समय भी इसी की महिमा से सम्‍पूर्ण जग की गति है। किसी की हत्‍या हो या कोई देश के लिए बलिदान देकर मृत्‍युप्राप्‍त हुआ हो, अन्‍तर क्‍या है कुछ नहीं। दोनों के दुनियावी भाव-विचार समाप्‍त। इनके स्‍वप्‍नों, आंकाक्षाओं, इच्‍छाओं पर विराम। इनके आधार पर पोषित स्‍वार्थ के चलते कुछ दिन तक इनकी मृत्‍यु पर दु:, पीड़ा, त्रास, संवेदना प्रकट होगी और पुन: इनके दुखी-समर्थक उलझ जाएंगे जीवनलोक की मारीचिका में। 

कहीं पढ़ा या सुना था कि किसी की मौत पर उसके सम्‍बन्‍धी इसलिए नहीं रोते कि उनका अपना नहीं रहा। बल्कि उनका अश्रु-अनुराग व्‍यतीत के उपस्थित रहते-रहते प्राप्‍त हो सकनेवाली वस्‍तुओं-सुविधाओं के स्‍थायी अभाव के लिए होता है। यह उक्ति मुझे हमेशा याद रहती है और इसलिए नहीं भुलाई जा सकती क्‍योंकि मैंने कई लोगों को देखा, जो अपने सगे की मौत पर दुख भूलने की स्थिति में कभी नहीं लगते थे। पर जीनेवाला समय के थपेड़ों में ऐसे फंसता है, इस प्रकार व्‍यस्‍त होता है कि जानेवाले का नाम और संकेत तक क्षण-क्षणांश के भी मोहताज हो जाते हैं। मैं भारतीय सेना के दो सैनिकों की मृत्‍यु और सफदरजंग से सिंगापुर तक साहस-मनीषा की ज्‍योत लहरानेवाली युवती की मौत से सामाजिक प्रभाव की पड़ताल कर रहा हूं। ये मौतें जनसंचार साधनों के श्रम से विशेष बनीं। लेकिन अनेक ऐसे हैं, जो गुमनामी में जिए भी मरे भी। बहुत ऐसे हैं जो जीते हुए तो गुमनाम हैं ही, मरकर भी (भूले) हुए हैं। तब भी अपने-अपने हिस्‍से की जिन्‍दगी सब गुजारते हैं और दिल से दुनिया बनानेवाले को पुकारते हैं कि तूने यह क्‍या चक्रव्‍यूह रच डाला

रात गहरा रही है। आसमान धवल-उज्‍ज्‍वल है। खिड़की से चन्‍द्रमा की फांक और टिमटिमाते तारे दिखाई दिए तो हृदयपटल प्रफुल्लित हो गया। अकाल मृतकों के अनुभवों के बीच अपना जीवनांश जागृत करता है। अपना जीवन जीते हुए आत्‍ममुग्‍धता हावी हो रही है। लगता है कि यदि भौतिकता सम्‍पन्‍न नहीं हूं तो क्‍या हुआ, जीवित तो हूं। क्‍योंकि राष्‍ट्र और इसके बाहर कहीं भी किसी भी पल मनुष्‍य का जीवन अपने निर्धारित समय के लिए भी सुरक्षित नहीं रहा। कोई धन और भौतिक सम्‍पन्‍न है तब भी, कोई निर्धन है तो भी। सबके लिए समय ने कलयुग रचा हुआ है। विद्वान या शैतान कोई कुछ नहीं है। भौतिकी से दुनिया चमकाने के स्‍वप्‍नपालक अपने ही मुंह पर विनाश की कालिख पोत रहे हैं। परम्‍परा से संजीवित होता आया दुनिया-जहां का लोकजीवन इनकी महत्‍वाकांक्षाओं से ध्‍वस्‍ताधूत होने के मुहाने पर है। 

बच्‍चों के निश्‍छल और निष्‍कपट प्‍यारे मुख देखकर मन सशंकित है। हमारे नहीं रहने पर ये क्‍या करेंगे? कैसे रहेंगे? क्‍या इनके लिए सोचकर हमारे कदम सही दिशा में बढ़ सकेंगे? हम प्रौढ़ अपनी जीवनोचित परिपक्‍वता पर काहे का दम्‍भ भरें, यदि पुष्‍प समान शिशु मानव को हमने समय रहते सुसंगत जीवन उद्यान उपलब्‍ध न कराया तो। बस यही विचार है, जो मुझे मथ रहा है बार-बार बराबर। अब मैं सुबह होने तक, धूप की पीली आभा व्‍याप्ति से पूर्व तक रात के निर्विकार अन्‍धेरे में समा रहा हूं। 


18 comments:

  1. ....बहुत गंभीर सोच डाला है :-)

    ReplyDelete
  2. बहुत गहन चिंतन...

    ReplyDelete
  3. गहन भाव अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  4. अंधेरे-उजाले का झूला.

    ReplyDelete
  5. एक रात के चिन्तन में सिमटा हुआ विश्व..गहन..

    ReplyDelete
  6. उम्दा प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई...६४वें गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं...

    ReplyDelete
  7. गर अहसास हो जाए
    छूटने न दिया जाए
    न तिनका, डूबने पर
    न पानी भरने पर
    जैसे तिनका नहीं डूब सकता
    वैसे ही छूट भी नहीं सकता
    क्‍योंकि छूट जाता है
    इसलिए पकड़ने वाला डूब जाता है।

    ReplyDelete
  8. गहरा प्रवाहमयी चिंतन......

    ReplyDelete
  9. विकेश जी ,आपने एक एक जटिल वास्तविकता को बहुत ही सहज ढंग से कहा है । ऐसा हमारे साथ होता है ।जब हम बहुत कुछ एक साथ लेकर चलना चाहते हैं तब असल में हम कुछ भी नही ले जापाते । यही बात है जो हमें लक्ष्यतक नही पहुँचने देती ।
    आपने कहानी पढी । अच्छा लगा ।

    ReplyDelete
  10. बहुत गंभीर सोच.बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें

    ReplyDelete
  11. गहन चिंतन...
    कई बार जब ये सारी बातें दिमाग में आती हैं तो युंही नींद से कबड्डी खेलना पड़ता है।।।।

    ReplyDelete
  12. सच है वर्तमान हालातों को देखते हुए मासूम बच्चों का चेहरा शायद सभी को उनके भविष्य के विषय में यह सोचने पर मजबूर कर ही देता है कि यदि हमने पुष्‍प समान शिशु मानव को समय रहते सुसंगत जीवन उद्यान उपलब्‍ध न कराया तो। तो क्या होगा उनका.. बस इसी 'तो' पर तो आकर अटकी है ज़िंदगी और यही सोच सोचकर तो अंधेरों और उजालों के बीच भटक रही है ज़िंदगी..। जल्द ही यदि इस दिशा में कोई सही कदम न उठाया गया तो हमारे इन नन्हें शिशुओं का जीवन भी यूं ही अन्धेरों उजाल के बीच भटकता ही रह जाएगा। विचारणीय आलेख...

    ReplyDelete
  13. Bahut sundar vichar prastut kiye bhai. Jai ho.

    ReplyDelete
  14. एक सच यह है की धनी या निर्धन सब के लिए ईश्वर ने भविष्य लिख रखा है.वर्तमान देखते हुए आगे का भविष्य अन्धकार में अधिक दिखता है..अगर समय रहते कुछ नहीं कर पाए तो आज के बच्चे न केवल नैतिक और धार्मिक बल्कि प्रकृति के भी बिगड़े स्वरूप में ही बढे होंगे.वह निश्चय ही सुखद माहौल नहीं होगा.

    ReplyDelete
  15. आपके चिंतन ने बहुत ही गहराई से सोचने को मजबूर किया......

    ReplyDelete
  16. बेहतरीन एहसासों का ताना बाना - जय हो भैया

    ReplyDelete