Wednesday, January 16, 2013

न जीने पर न मरने पर




सांस लेने से पूर्व
मृत्‍यु के नाम पर
प्रसन्‍न हो मेरा मन नाचता

खुली आंखों से संसार देखता
मैं और मेरा भाव
सच्‍चा भ्रम बन जाता   

एक शक्तिवान व्‍यक्तित्‍व, राजा, प्रसिद्ध प्राणी
मृत्‍यु के बाद अदृश्‍य हो जाता

तब भी दुनिया इधर से उधर, उधर से इधर
जीवन कार्यों के लिए भागती रहती
और अदृश्‍यात्‍मा को विस्‍मृत कर देती    

एक कमजोर व्‍यक्ति, बेघर, निर्धन
जीते जी मृत्‍यु का पूर्वाभ्‍यास करता
और मृत्‍य के बाद शायद जीवन जीता

वह तो भागती दुनिया को 
न जीते जी नजर आता
और न मरने पर

कुछ भी तो नहीं ठहरता 
कभी किसी के लिए
न जीने पर न मरने पर

सब चलता रहता है
सब चलते रहते हैं    
नामालूम किसलिए किसके लिए?      

6 comments:

  1. जब जाना है एक दिन सबको,
    काहे जीवन पर मोह धरें।
    काहे हतप्रभ भयभीत रहें,
    काहे संचित अवरोध धरें।

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  2. आपकी कवितामयी टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद।

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  3. चिंतनपरक सार्थक
    सुंदर रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

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  4. कुछ भी तो नहीं ठहरता
    कभी किसी के लिए
    न जीने पर न मरने पर

    ....सब कुछ जानते हुए भी क्यों अजाने बने रहते हैं लोग...शाश्वत सत्य को दर्शाती बहुत गहन और सार्थक प्रस्तुति...

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  5. ये बना बनाया ड्रामा है .इटरनल साइकिल है .जो एक ख़ास कालावधि के बाद खुद को दोहराता है न राजा रहेगा न रंकगति .कर्तम सो भोगतम .कर्म गति टारे न टरे .

    सबका अपना प्रारब्ध पाथेय एकाकी है ,

    अब होश हुआ जब इने गिने दिन बाकी हैं .बढ़िया प्रस्तुति विकेश भाई .स्थूल से सूक्ष्म की ओर ,काया से आत्मन (आत्मा )की ओर .न कोई रहा है न कोई रहेगा .

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  6. बहुत बढ़िया विकेश भाई | आभार

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