Sunday, January 27, 2013

छब्‍बीस जनवरी

देशभक्‍तों की दृष्टि से एकाकार होतीं हमारी दृष्टियों में गणतान्त्रिक भाव गहरे बस जाता है। राष्‍ट्र के शहरों-ग्रामों में तिरंगे ध्‍वज को फहराने से लेकर दिल्‍ली स्थित राजपथ पर सशस्‍त्र सेना परेड के रुप में गणतन्‍त्र मनाना देशप्रेम के स्‍थान पर महाऔपचारिकता का विचित्र निबाह ही रह गया है। पन्‍द्रह अगस्‍त, छब्‍बीस जनवरी दिवसों के प्राकृतिक दृश्‍यों को देख ज्ञात होता है कि हमारे राष्‍ट्र के ये दो अतिमहत्‍वपूर्ण दिवस प्रकृति के लिए कितने अहम हैं। इन दो दिनों की प्रकृतिप्रदत्‍त शोभा सामान्‍य दिनों की अपेक्षा अधिक प्रभावी होती है। शीतल पवन सरसराहट के साथ शुरु हुआ दिन प्रहर-दर-प्रहर अपने नैसर्गिक रंग बिखेरता रहा। पूर्व दिशा में बेलपत्र का पच्‍चीस फुट लम्‍बा वृक्ष अपने हरे-चमकते पत्‍तों के झुरमुट से सूर्य की स्‍वर्ण किरणों को घर में प्रवेश करा रहा था। नीलानभ जैसे दिन विशेष के लिए ही स्‍वच्‍छ, उज्‍ज्‍वल हो विद्यमान था। बेदाग आकाश का नील रंगायन मेरी पथरीली आंखों और पतित आत्‍मा को जीवन्‍त कर गया। बेलपत्र के हरे-पत्‍तों के झरोखों से आसमान के नील-विस्‍तार पर विचरित मेरे चक्षु धन्‍य हो गए।
      अपने शरीर देश के लिए बलिदान कर चुके वीरों की आत्‍मध्‍वनि इस प्राकृतिक आभामण्‍डल में गूंज रही थी। सुन्‍दर वातावरण जैसी ही सुन्‍दर उनकी परमात्‍माओं से लगकर मेरी आत्‍मा भी सिहर उठी। वीरों की अन्तिम प्राणगति के अनुभव से ह्रदय टूटकर बिखर गया। लगा जैसे कोई अपने प्रियतम की विरह पीड़ा से छटपटाने लगा हो। अत:स्‍थल की नीरवता में भावों का भंवर उठा। नयनों से जलधार फूट ही जाती यदि चहुंओर की भौतिकता में भाव-पग न धरा होता तो।
     वीर-भाव अनुरागी समय मेरे लिए स्‍थायी नहीं है। घर-गृहस्‍थी की परीक्षाओं और कार्यालयी दीक्षाओं के लिए भी मेरा समय नियत है। उनमें विचरण करते ही मेरा आज का महानुभव पीछे छूट गया। मैं पुन: इक्‍कीसवीं सदी के घर्षण में लिप्‍त हो गया। एक ऐसा संघर्षण जिसमें सुधी मन्‍तव्‍यों की बलि देनी होती है और रखना होता है प्रज्‍वलित निरर्थक खपने का विचार, जिसका सदियों के पृष्‍ठांकन में कोई सार्थक अंकन नहीं है। इस कुसमय में सार्थकता की कोई पूछ नहीं है। मन-मानुष की दशा-दिशा दिग्‍भ्रमित है। कालान्‍तर के पृष्‍ठ हमारे लिए क्‍या पशुवत् जीवन गुजारते मानव की परिभाषा गढ़ रहे हैं। निश्चित ही ऐसा कुछ होने जा रहा है। देशी-विदेशी सत्‍ता प्रतिष्‍ठान अहंभावी ज्‍वालामुखी बन चुके हैं। उनके सम्‍मुख सत्‍कार, सज्‍जन, सत्‍य बुरी तरह हांफ रहे हैं और ज्‍वाला में भस्‍म होने के लिए विवश हैं।
मध्‍यरात्रि को चन्‍द्रमा का दूधिया प्रकाश बेलवृक्ष और इसके पत्‍तों, घर, आंगन, यहां-वहां हर ओर व्‍याप्‍त है। रात्रि के अपने इस नए स्‍वरुप की सुबह के समय में दुखद विलीनांजलि से पूर्व ह्रदय इस दुग्‍धरंगीता चन्‍द्र बरसात में खूब भीग जाना चाहता है। यह अभौतिक रात्रि सुन्‍दरता एक स्‍थूल शरीर के व्‍यक्ति को कितना दुख देती है! आंखों और पलकों के बीच के समय भाव सुदूर तक चन्‍द्रमयी आकर्षण में बन्‍ध गए हैं। दिनभर बलिदानी वीरों की लगन में जो मानवीय भाव जागृत हुए, जीवन-पुंज इन्‍दु और इसके प्रकाश में उनका सम्मिश्रण मेरे लिए आघात बन गया है। नवप्रभात की बेला में रात्रि के ये दिग्‍अनुभव सच्‍चे भ्रम बन जाएंगे। इसीलिए इस रात्रि में ही इनको जीने और इनसे बिछड़ने का जीवन जी रहा हूं।

11 comments:

  1. भावों की लहरों में अपने साथ बहा ले जाती बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  2. विकेश जी सृष्टि के सौन्दर्य को भी और भौतिक अनुभूतियों को आप गहराई के साथ जीते हैं । तभी आप इतनी जीवन्तता से लिखते हैं ।
    वीर-भावानुरागी स्थायी रूप से मैं कभी नही रहा ...। सच है सारे भाव साथ रह सकते हैं पर आज की व्यवस्थाओं के ढाँचे में ढलते हुए वीर भाव ही छोडना पडता है । बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. वैचारिक विवरण.....प्रवाहमयी

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  4. बहुत खूबसूरत....
    एक कविता की तरह....

    अनु

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  5. बहुत सुन्दर रचना ......मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  6. मोनिका जी की बात से सहमत वैचारिक विवरण...

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  7. बहुत सार्थक अभिव्यक्ति। ६५वें गणतंत्र दिवस कि हार्दिक शुभकामनायें !

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  8. प्रवाहमयी भाव..... बेहतरीन अवलोकन

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