Saturday, December 8, 2012

हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या



हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या
 सदैव बनी रहती है

उच्‍चतम न्‍यायालय का नया निर्णय कि यदि किसी खाताधारक के चैक पर किए गए और बैंक के पास अभिलेखित उसके हस्‍ताक्षर का मिलान नहीं होता तो उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज होगा। न्‍यायूर्मि टीएस ठाकुर और न्‍यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने इस मामले में गुजरात उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय को निरस्‍त करके यह नया फैसला सुनाया। उच्‍च न्‍यायालय की व्‍यवस्‍था थी कि चेक डिसऑनर होने पर आपराधिक मामला चेक जारीकर्ता के खाते में अपर्याप्‍त राशि पाए जाने की स्थि‍ति में ही बनता है।
      माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय का यह निर्णय किसी भी दृष्टिकोण से आम जनता के हित में नहीं है। अपनी व्‍यक्तिगत पहचान के तौर पर कागज-पत्रों में अंगूठा लगानेवालों को यदि छोड़ दिया जाए तो बाकी बैंक खाताधारकों के लिए य‍ह कदम अत्‍यंत ही विचलित करनेवाला है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में जब तमाम कार्यों के लिए हस्‍तलिखित आवेदन या प्रपत्र भर कर देना अब बीती बात हो चुकी हो, हमेशा एकसमान हस्‍ताक्षर करना असंभव तो नहीं पर मुश्किल जरुर है। बैंक और अनेक अन्‍य निजी प्रतिष्‍ठान भी ग्राहकों से लेन-देन करते वक्‍त कम्‍प्‍यूटर मु्द्रित आवेदन, रसीदी पत्र की मांग करते हैं और वे खुद भी इन्‍हें ही जारी करते हैं। बल्कि बैंक के ही कई रसीदी पत्रों में लिखा हुआ रहता है कि चूंकि यह कम्‍प्‍यूटर निर्मित रसीद है, इसलिए इसे हस्‍ताक्षरित करने की जरुरत नहीं है। जब एक प्रतिष्‍ठान हस्‍ताक्षर के झंझट से बचने के लिए प्रौद्योगिकी का सहारा लेकर अपने अनगिन काम विश्‍वसनीयता और गुणवत्‍ता से निपटा लेता है, और ग्राहक या उपभोक्‍ता भी लेन-देन के लिए इन कम्‍प्‍यूटर जनित रसीदों और पत्रों को साक्ष्‍य के रुप में स्‍वीकार कर लेता है, तो पिर समस्‍या कहीं नहीं रहती। ऐसे में चैक पर किए गए हस्‍ताक्षर का बैंक के पास मौजूद खाताधारक के हस्‍ताक्षर से मिलान नहीं होने पर न्‍यायालय की आपराधिक मुकदमे की व्‍यवस्‍था बहुत ही अव्‍यावहारिक कदम है। चूंकि आज ज्‍यादातर काम कम्‍प्‍यूटर या मशीनों के द्वारा पूरे होते हैं, इसलिए इन कार्यों की हस्‍तलिखित रिपोर्टें बना कर, उनकी जांच कर उन पर हस्‍ताक्षर करने का चलन खत्‍म हो चुका है। सरकारी सेवाओं में चपरासी से लेकर उच्‍च पदस्‍थ अधिकारी द्वारा हस्‍तनिर्मित फाइलिंग करने और इनमें अंकित टिप्‍पणियों पर हस्‍ताक्षर करने का रिवाज तो अभी भी है, लेकिन निजी प्रतिष्‍ठानों में लेखा और अन्‍य विभागों के बड़े अधिकारियों को छोड़ दिया जाए तो सभी विभागों के छोटे कर्मचारियों द्वारा अपनी कार्य निष्‍पादन रिपोर्ट में हस्‍ताक्षर करने की कोई कार्यालयी प्रणाली नहीं है। जब अधिकांश कर्मचारी अपनी कार्य संबंधी रिपोर्टों में हस्‍ताक्षर नहीं करते हों, तो वे केवल बैंक चैक में एकसमान हस्‍ताक्षर कैसे कर सकते हैं। वेतनभोगी लोग बैंक में यदा-कदा लेन-देन करते हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना कि उनके हस्‍ताक्षरों का हर बार, बैंक के पास उपलब्‍ध उनके हस्‍ताक्षर से मिलान हो, बड़ी असम्‍भव बात है। ज्‍यादातर लोगों के हस्‍ताक्षरों का अपने पहले किए गए हस्‍ताक्षर से मिलान नहीं होता। ऐसे में यह नया और निष्‍ठुर न्‍यायालयी आदेश, आम आदमी के पहले से ही कष्‍टकारी जीवन को और ज्‍यादा दुखदायी बनाएगा। न्‍यायालय को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की जरुरत है।
बैंक चैक के माध्‍यम से किए गए दुतरफा लेन-देन में विवाद होने की स्थिति में इस कानून के अन्‍तर्गत आपराधिक मुकदमा चलाना तो ठीक है। ऐसी स्थिति में पीड़ित को नयाय और दोषी को दण्‍ड तो मिलना ही चाहिए। लेकिन यदि उपभोक्‍ता एकल रुप से बैंक लेन-देन के दौरान हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या में फंसता है, तो इस स्थिति में उस पर आपराधिक मुकदमा चलाना विधि सम्‍मत नहीं हो सकता।

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