Thursday, December 6, 2012

मतांतर से उपजा भटकाव




आओ सबके कल्‍याण के लिए 
मिलकर आगे बढ़ें
आज देश की स्थिति अत्यन्त जटिल है। भारत के सम्मुख उभरी इस जटिलता के प्रति क्या वाकई व्यक्तिगत लगाव उभरता है\ संसद से लेकर सड़क तक देश की चिंताओं में उठा आक्रोश और गुस्सा क्या सैद्धांतिक सीमा लांघकर परिवर्तनकारी क्रांति का वायस बन सकेगा\ क्या कुछ ऐसा संभाव्य है, जो व्यावहारिक तौर पर भ्रष्टता और धृष्टता को कुचल सके\ सबसे पहले तो भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति अपनी मानसिक उद्विग्नता को हम सब प्रबुद्ध लोगों को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना होगा। हमें समस्याओं की तह तक पहुंचने और उनका समूल निस्तारण करने के लिए अपनी कार्ययोजनाओं को व्‍यावहारिक बनाना होगा। केवल उच्च सिद्धांत व सद् विचार प्रसार से काम नहीं चलनेवाला। विचारों की जीवनोचित और सामाजिक महत्‍ता यदि बुद्धिजीवियों के वैचारिक आदान-प्रदान तक ही सीमित हो जाएगी, यदि इसका देश के पिछड़ेपन और भ्रष्टता के निवारणार्थ व्‍यावहारिक प्रयोग न हो सका, तो यह किसी भी स्तर पर किस काम की रह जाएगी! विशेषकर आज के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और आधुनिक उथल-पुथल के समय में किसी भी बुद्धि, विचार, सत्‍ता, संसद, प्रगति का महत्व मनुष्य के कल्याणार्थ ही होना चाहिए ना कि एक ऐसी दुनिया रचने में, जो लक्ष्यविहीन होकर तमाम मूल्यों, मर्यादाओं की कीमत पर मशीनी गठन तक केन्द्रित हो जाए। स्थिति ये हो चुकी है कि हम सब व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आधुनिक अवधारणा में दोहरे चरित्र के साथ मौजूद हैं। एक चरित्र हमारे स्वयं के विचारों और धारणाओं से संचालित है तो दूसरे पर हमारे मार्गदर्शकों, प्रतिनिधियों का कब्जा है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे में निजी नैतिकता के अनेक विचारों और मार्गदर्शनों का, प्रतिनिधिकरण के नाम पर थोपे गए नैतिकता के विचारों से एकीकरण असंभव है। और जब ऐसा है और हमेशा ही ऐसी स्थिति रहेगी तो फिर समग्र सुधार का सपना कभी सच हो ही नहीं सकता।
पिछले साल अगस्त में और इस साल जुलाई में फिर से हुए अण्णा आंदोलन ने आंदोलनकर्ताओं की नैतिकता के अलग-अलग रूप दिखाए। कुछ ने इसे सिर्फ सामाजिक जनजागरण और चेतना जागृति के अभियान के रूप में माना तो अनेक ने इसे व्यवस्था का हिस्सा बनकर भ्रष्टाचार मिटाने के रूप में लिया। हुआ भी यही कि टीम अण्णा भंग कर दी गई और टीम के केवल जनजागृति चेतना के पक्षधर व राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़े होकर भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने को आतुर दूसरे पक्ष के बीच ही अपने-अपने लक्ष्यों के प्रति रास्तों के चुनाव में मतभेद उभरकर सामने आए। हालांकि अण्णा ने राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा तो कर दी और पूरे देश में घूमकर ईमानदार और अच्छे राजनीतिक प्रत्याशी देने की बात भी कही, परन्तु चुनाव जीतने की स्थिति में मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं होने की बात भी उन्होंने की। उन्होंने कहा कि वे मंत्रिमण्डल पर नजर रखेंगे और किसी के भी गलत होने पर वे उसके कान खींचेंगे। प्रश्‍न यह है कि क्या यह इतनी सहजता से हो सकेगा\ क्योंकि सरकारी चलाने की स्थिति और सरकार बनने से पहले की स्थिति में एकरूपता कायम नहीं रह सकती। और यहां एकरूपता नहीं रहने के कारक तो आंदोलन के दो धुरियों में मुड़ने से ही पैदा होने लगे हैं। बाद में समूह के सदस्यों में नैतिकता, सामाजिकता और धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता के चलते मतभेद न उभरें, इसकी क्या गारंटी है। क्योंकि पिछले पैंसठ सालों से इस देश की लोकतांत्रिक शासन पद्धति में ऐसा नहीं हुआ कि यहां सज्जन, कर्मठ और देशभक्त नेता हुए ही नहीं। ऐसे बहुत से नेताओं ने देशहित में अनेक सपने संजोकर संसद के गलियारों में बहुत भागदौड़ की। परन्तु यहां भी वही स्थिति उभरकर आई, जो आज अण्णा समूह के सदस्यों के मध्य बरकरार है। तब भी नेताओं की व्यक्तिगत सोच एकरूप और एकनिष्ठ नहीं हो पायी। लोकतांत्रिक नैतिकता और मर्यादा के विपरीत अलग-अलग सोच रखनेवाले नेताओं ने अंततः अपने प्रयास अधर में ही छोड़ दिए और देश की राजनीति को एक नई बौखलाई और लोलुप राजनीतिक-पीढ़ी के हवाले कर दिया। इसने राष्ट्रीय उत्‍तरदायित्व और राष्ट्रधर्म की निष्ठा को ताक पर रखकर सम्प्रदाय, जाति, क्षेत्र के आधार पर नए राज-काज की स्थापना की। यह राज-काज वही है, जिसका दंश आज प्रत्येक संवेदनशील भारतीय झेल रहा है। इसी के विरूद्ध आजकल आंदोलनों की भरमार है। अनेक छोटे बड़े स्तर के आंदोलनों से जनसाधारण सत्‍ता के उस सच को तो जान ही गया है, जो आधुनिक होने के नाम पर शीर्ष स्तरीय अवैध पूंजीगत लेन-देन की पराकाष्ठा है। जनता के साथ किया जा रहा यह ऐसा दुराग्रह है, जिसके विरूद्ध खड़े होनेवालों को अदनी सी गलती के लिए भी अदालती और दण्डात्मक कार्रवाई के लिए धमकाया जा रहा है। ऐसी तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर जो सार्वजनिक आग्रह सत्‍ता के विरूद्ध निकलकर सामने आ रहा है, उसके प्रवाह से सत्‍तासीनों को चेत जाना चाहिए। क्योंकि संभलने के मौके भी बार-बार नहीं मिलते।
        ऐसे में तो वही कहावत याद आती है कि जिसकी चलती है उसकी तो बकवास भी अच्छी लगती है। आज हमारे कर्ताधर्ताओं ने आंख मूंदकर देश के जीवन के लिए जो हवा पानी उपलब्ध कराया है, उसमें आम आदमी को घुटन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में विकास, आधुनिकता, जीडीपी, विदेशी मुद्रा भण्डार इत्यादि मानदण्डों के पीछे हो रही देशद्रोही साजिश का तानाबाना आज खुला पन्ना बन चुका है। इसे आम और खास दोनों आसानी से पढ़ सकते हैं। सत्ताधारियों को जिन आंदोलनों की लपटों से अपने महलों के जलने का डर था, वे अब अपने वाहकों और संचालनकर्ताओं के मतांतरों से स्वयं को झुलसाने में लगी हुई हैं। ऐसे में आंदोलन के अधिष्ठाताओं को एक महत्वपूर्ण सामाजिक बिन्दु पर केन्द्रित होकर एक साथ आगे बढ़ना होगा। अन्यथा सामाजिक विखंडन को हवा देनेवालों को इससे अच्छा आभास और क्या हो सकता है कि सही सोच और लक्ष्य के साथ उनके विरूद्ध खड़े होनवाले अपने ही स्तर के मतैक्यों में पड़कर बिखरने लगे हैं। इस समय महंगाई, भ्रष्टाचार, आधुनिक कुरीतियों को मिटाने के लिए एक ऐसी क्रान्ति की जरूरत है, जिसके वाहक सर्वकल्याण की विचारधारा से अत्यन्त मजबूती से जुड़े हुए हों और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए शुरू से लेकर अन्त तक उनमें एक जबर्दस्त दार्शनिक गठबन्धन हो। अपने इष्ट कर्तव्य के प्रति उनके इस तरह एकनिष्ठ और शक्तिवान बने रहने से निश्चित ही भ्रष्टाचार और भ्रष्टतंत्र को झुकाने में सफलता मिलेगी। परन्तु आम जनता की सामाजिक सजगता के बिना सफलता प्राप्त करना कठिन है। कोई भी आंदोलन, चाहे वह सामाजिक हो या राजनीतिक, जनजागरण की भावी संभावनाओं पर ही टिका रहता है। इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हेतु ऐसी संभावनाओं के ज्वार को भाटा बनाने की विशेष जरूरत है।

3 comments:

  1. करवाते वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत रहिये.

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  2. ज़बरदस्त लेखन विकेश भाई | मज़ा आ गया पढ़कर | पूरी तरह सार्थक लेख |

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