महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, December 6, 2012

बालमन की संवेदना






बेटी को चार साल पूरे हो गए। पांचवे वर्ष में प्रवेश के साथ ही उसमें जीवन र‍हस्‍य को जानने-समझने की वृत्ति घर कर गई। इसका अंदाजा मुझे तब हुआ जब वह मोबाइल फोन पर जिन्‍दगी का सफर है ये कैसा सफर गीत को सुनते हुए फटी-फटी आंखों से शून्‍य में निहारती रही। मुझे आभास हो गया कि बालमन ने थोड़ी देर के लिए रहस्‍यात्‍मक गंभीरता ग्रहण कर ली है। बचपन में उसका ऐसा सयानापन मुझे अपनी बेटी के प्रति श्रद्धा और चिंता दोनों से भर गया। मैं सोचने लगा कि बचपन इंसान की संवेदना नापने का सही पैमाना है। इस आयु में उसके जीवन दर्शन की दिशा तय होती है। बेटी के बारे में सोचते-सोचते मैं अपने बचपन में जा पहुंचा। मैं भी चार पांच साल की अवस्‍था में अकेले बैठकर विचार करता था कि जीवन क्‍या है, क्‍यों है! सोचता था कि अगर संसार में कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! आकाश, धरती, पेड़-पौधे, जीव-जन्‍तु, आग, पानी, हवा, हरियाली कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! इन जीवन पर्यायों की अनुपस्थित का भाव मुझे अत्‍यंत डरावना प्रतीत होता। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आतीं। दुनिया में कुछ भी न होने और सर्वत्र अंधकार व्‍याप्ति की भावना से मैं इतना घबरा जाता कि बचपन की सामान्‍य मौज-मस्‍ती भी भूल जाता। खेलकूद, दौड़भाग और उछलकूद के दिनों में, मैं जीवन दर्शन के पहलुओं से उलझने लगा। इसका बुरा असर मेरे शारीरिक विकास पर हुआ। इसके साथ मेरी मानसिक स्थिति भी अत्‍यधिक विश्‍लेषणात्‍मक हो गई। हर बात, विचार और कार्य से पहले मैं इनके विभिन्‍न परिणामों की कल्‍पना करने लगता। मतलब मेरे जीवन की हरेक गतिविधि सुचारु हो गई और उसके स्‍वाभाविक रुप से घटने का कोई रास्‍ता नहीं बचा। अपने ऐसे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन से समाज और दुनिया के लिए तो मैं संवेदनशील हो गया। पर स्‍वयं को मैंने मानसिक ऊहापोह और भ्रम के संजाल में फांस दिया। परिणामस्‍वरुप मानसिक तौर पर मैं अत्‍यधिक संवेदनशील हो गया। सद्भावना, ऊंची सोच, उत्‍तम विचार, गहन चिंतन-मनन, पठन-पाठन और अध्‍ययन के दौरान तो यह संवेदनशीलता सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार करती है। लेकिन सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं के चलते ये मुझे ऐसे दिमागी झंझावातों में फंसा देती है कि पागल होने तक की नौबत आ जाती है। त‍ब लगने लगता है कि सामाजिक समस्‍याओं के बीच जीने के लिए संवेदनशील नहीं बल्कि दिमागी रुप से परिवर्तनशील होना चाहिए। बेशक ये परिवर्तन आज मानव को जानवर बनने पर मजबूर करते हों, पर इन्‍हें ही स्‍वीकार करके, इन्‍हें ही अपना कर देहावसान से पहले तक जिंदगी चैन से गुजारी जा सकती है। 
      अल्‍पायु में बिटिया की जीवन संवेदना से उपजी श्रद्धा और चिंता के पीछे मेरा अपना जीवन एक उदाहरण है। अपनी जिंदगी में संवेदना के प्रति मैं जितना समर्पित रहा, उतना संवेदनामयी प्रतिफल मुझे नहीं मिला। समाज के दोहरे रवैये के कारण मेरी संभावनाएं कुंठित हो  स्थिर हो गईं हैं। दिल और दिमाग में ही ऐसे नकारात्‍मक असर होने की बात होती तो ठीक था। शारीरिक रुप से तो जिंदगी प्रफुल्लित और स्‍वस्‍थ रहती। लेकिन नहीं, कुंठाग्रस्‍त संभावनाओं ने तो शरीर पर भी बुरा प्रभाव डाला।
बिटिया का विकसित होता जीवन-दर्शन और संवेदन मन मुझे यदि उसके प्रति श्रद्धेय बनाता है, तो उसके प्रति चिंतित भी करता है। यदि संवेदनशील बन कर वह मुझे सदाचारी, सज्‍जन, सचरित्र और अच्‍छी प्रतीत होगी, तो उसके ऐसे बने रहने में मेरा स्‍वार्थ है। क्‍योंकि सदाचारी संस्‍कृति के पूर्वाग्रहों से पोषित अपनी मान्‍यताओं के अनुसार मैं उसे ऐसा ही बनाना चाहूंगा। लेकिन इन पूर्वाग्रहों से होकर गुजर रही मेरी अपनी जिंदगी जब चैन व सुकून से नहीं कट रही तो फिर अपनी ‍बेटी के लिए मैं क्‍या नया सोचकर ऐसे पथ पर बढ़ने की अपेक्षा करता हूं! मुझे दृढ़ आभास है कि ढकोसलों से भरी दुनिया और द्विअर्थी सामाजिक ताने-बाने में उसकी ये खूबियां बड़े होते-होते कुत्सित और कुण्ठित हो जाएंगी। इसलिए बाल-जीवन में उभरी उसकी गम्‍भीरता से खुश होने के बजाय मैं बड़े होते-होते तक उसके नटखटपन से परेशान होने के लिए तैयार हूं। पर ऐसा हो तो! आजकल के बच्‍चों पर टेलीविजन विज्ञापनों में प्रसारित सुविधायुक्‍त, सरल जीवन दर्शन का बुरा प्रभाव पड़ता है। वे वास्‍तविक जीवन को भी ऐसा ही मान लेते हैं। जबकि पूंजी, मुद्रा लाभार्जन के उद्देश्‍य से टी.वी. विज्ञापनों में दिखाई जा रही आभासी दुनिया वास्‍तविकता से बहुत दूर है। यही अन्‍तर बचपन को जीवन के स्‍पष्‍ट व्‍यवहार से मिलने नहीं देता। और अंतत: बड़े होते बच्‍चे कठोर जीवन सच्‍चाइयों को झुठला कर आभासी कोण पर आ कर स्थिर हो जा रहे हैं। इसके दु‍ष्‍परिणाम सभी देख रहे हैं।
बच्‍चों के प्रति उभरती प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष सामाजिक विसंगतियों से मानुषिक जीवन अत्‍यंत संकीर्ण हो गया है। यह तो अंधेरी गुफा में लक्ष्‍यविहीन होकर चलने की जिद्दी मानव प्रवृत्ति है। इससे अंततोगत्‍वा विनाश ही तय होगा। बालमन की संवेदनाओं को पल्‍लवित-पुष्पित करने के लिए हमें बेढंगी सामाजिक रुढ़ियों को समूल मिटाना होगा। बच्‍चों के हृदयाकाश में टिमटिमाते मासूम और निश्‍छल भावों के अनुकूल सामाजिक-सांस्‍कृतिक दायरे का विकास करना होगा। सम्‍पूर्ण संसार में सुखद जीवन की कल्‍पना तब ही साकार होगी जब बच्‍चों के लिए संस्‍कारसम्‍म्‍त सामाजिक वातावरण बन सकेगा।

1 comment:

  1. आपने जो लिखा उसे पूरी तरह सहमति है। लेकिन आज की इस आधुनिक दुनिया में या आभासी दुनिया में चाहे जो कह लीजिये। जो कुछ भी हो रहा है उसके प्रभावा से आप अपने बच्चों को बचा कर चल नहीं सकते है। लाख कोशिश कर लीजिये इस सब का असर तो उन पर होगा ही। बेहतर है बच्चों को पानी की तरह जीवन जीने की शिक्षा देना... नहीं ? मेरी कोशिश तो यही रहती है कि जब जैसा माहौल हो, मेरा बेटा उसमें खुद को घुला मिला ले। बस जरूरत है सही और गलत में पहचान करने कि शिक्षा देना। एक बार यह अंतर समझ आजाये तो ज़िंदगी आसान बना जाती है।

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards