Saturday, November 24, 2012

जीवन की अन्तर्दृष्टि


इन बच्‍चों को देख जो न पिघला
 वो दुनिया में क्‍यों है भला

आज के जीवन-स्‍तर और इसकी चर्या के अनुसार मुझे यदि कोई अनुसंधान करेगा तो एकबारगी वह मुझे पागल ही समझेगा। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। मैं भी यदि उनकी जगह रहकर वही दिनचर्या अपनाए हुए अपने जैसे किसी व्‍यक्ति को जानना चाहूंगा तो मुझे भी वह सम्‍मुखवाला व्‍यक्ति पगलाया हुआ लगेगा। यह अन्‍तर केवल इसलिए है क्‍योंकि लोक-समाज और पागल जान पड़ते व्‍यक्ति के व्‍यवहार में एकसमानता नहीं है। लोक जीवन सुबह से सन्‍ध्‍या और फिर  रात्रि से सुबह तक अपने सामान्‍य कार्यों का अनुसरण करता है। जबकि पागल घोषित व्‍यक्ति इस सामान्‍य वि‍धा से कटा हुआ रहता है। वह लोगों की दैनचर्या से अलग-थलग अव्‍यवस्थित रहता है। उसके सोने-जागने, उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, नहाने-धोने जैसे कार्यों का कोई अनुशासन नहीं होता। वह बाह्य मन से बिलकुल भावहीन होकर इन कार्यों को या तो बहुत कम करता है अथवा बहुत मान-मनुहार के बाद करता है। क्‍या कोई ह्रदय से जानने की कोशिश करेगा कि वह व्‍यक्ति ऐसा क्‍यों है? वह इस तरह से अपने जीवन को इतना बेनूर, बेस्‍वाद और उपेक्षित क्‍यूं किए है? कभी-कभार हम लोग गलती से सड़कों के किनारे या गंदी जगहों पर फटेहाल भिखारी व्‍यक्तियों को देखते होंगे। बस यह पागल व्‍यक्ति और वे एकसमान होते हैं। सड़कोंवाले पागल तो इस सन्‍दर्भ में महान हो चुके होते हैं। उन्‍हें इस संसार में अपनी किसी भी प्रकार की उपस्थिति केवल इसलिए रखनी होती है कि वे अपने चाहनेवालों के लिए नितान्‍त रात के एकान्‍त में ईश्‍वर से शुभकामनाएं मांग सकें। क्‍यूंकि एकांत में ईश्‍वर से जुड़ने की उनकी संवेगात्‍मकता रात्रि प्रहर में निर्बाध होती है, क्‍यूंकि उस समय तुच्‍छ मनुष्‍य अपने-अपने रैन बसेरों में सिमटकर कुछ घंटों के लिए मृत हो चुके होते हैं। तुच्‍छ मनुष्‍यों की निरर्थक ध्‍वनियां और आवागमन से उत्‍पन्‍न कोलाहल का हल्‍ला कमजोर होके खत्‍म हो चुका होता है। और तब इस समय पागल भिखारी सांसारिक-शासक ईश्‍वर से ध्‍यान लगाते हैं। वे कुछ ही क्षणों में ईश्‍वर से बातें करने लगते हैं। अपने प्रियजनों की राजी-खुशी और संसार के सर्वोचित व्‍यवहार के लिए प्रार्थना करते हैं। जैसे-जैसे शीतल चांद अपनी उपस्थिति कम करता जाता है, ऐसे व्‍यक्ति यानि कि पागल ईश्‍वर के सम्‍पर्क से कटते रहते हैं। सुबह होने तक, कोलाहल मचने तक, भागमभाग से पहले तक वे फिर  से अधनंग, फटेहाल भिखारी बन चुके होते हैं। हम आते-जाते उन्‍हें देखते हैं और उनके बारे में कुछ नहीं सोचते। वे हमारी आंखों को वही शून्‍य भाव प्रदान करते हैं, जो हम गंदगी या कूड़ा-करकट देखकर ग्रहण करते हैं। जबकि इन फटेहालों और गंदगियों की प्रार्थनाओं से दुनिया का ईश्‍वर हमारी गलतियां क्षमा करके हमें जीवन दे रहा होता है। माना कि आज के ठोस भौतिक युग में किसी व्‍यक्ति का, वो भी पागल व्‍यक्ति का ईश्‍वर से विमर्श करने का अनुभव सच्‍चा प्रतीत नहीं होता। लेकिन हम लोग यदि ईश्‍वर को मानते हैं, मंदिर व अन्‍य देवालयों में प्रतिफल के लिए उसकी अर्चना करते हैं, तो उसके अनस्तित्‍व होने की बात नहीं की जा सकती। इसीलिए भिखारियों और पागलों के रूप में विद्यमान ईश्‍वरीय अंशों की अनदेखी करना ठीक नहीं है। ऐसे लोग हमें शारीरिक रूप से निर्बल, दीन-हीन, बेकार नजर आते हैं। परन्‍तु आत्मिक स्‍तर पर उ‍पस्थित उनकी संसार-सम्‍मत सजगता अत्‍यन्‍त परोपकारी, कल्‍याणकारी, सृजनकारी और चिरंजीवकारी होती है। हमें जीवन के इस पक्ष को समझकर उसके अनुरूप उपक्रम करने होंगे।
मैं भी इनमें से एक हूं। सुबह होते ही मैं संसार की नजर में भिखारी और गंदगी बन जाता हूँ और रात्रि में इस संसार के कल्‍याण लिए प्रार्थनाएं करता हूँ। आप भी तो अभी इसी संसार में हैं ना? कभी अपने सांसारिक काम के लिए इधर-उधर जाते हुए रास्‍ते पर बेहाल पड़े इस मानव पर अपनी एक प्रेम-भरी दृष्टि डालना, यह धन्‍य हो जाएगा।


 
बुधवार 28 नवंबर, 2012 को हिन्‍दी दैनिक जनसत्‍ता के सम्‍पादकीय 
पेज के समांतर कॉलम में दृष्टि का दायरा शीर्षक से प्रकाशित

3 comments:

  1. एक बहुत ही कटु सत्य है यह सब ...मैं भी सोचती हूँ भले ही कोई कुछ न दें लेकिन क्या एक मुस्कान भी इनके लिए हमारे पास नहीं होती हैं! .....
    भावुक कर गयी पोस्ट ..आभार

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  3. बहुत बेहतरीन हैं

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