Monday, November 26, 2012

देशभक्ति या राजभक्ति



बोल, सुन, देख न बुरा 
पर मुंह छिपाकर कर बुरा

कसाब को हुई फांसी का निहितार्थ उस आम धारणा के करीब नजर आता है, जो कसाब को फांसी देने तक सीमित न रहकर उसको उकसानेवाले तत्‍वों को कठोरतम् दण्‍ड देने के भरसक पक्ष में है। छब्‍बीस ग्‍यारह के हत्‍यारे को मौत का दण्‍ड मिलना देशप्रेम की भावनातिरेक में जीनेवालों और वीरगति को प्राप्‍त लोगों के परिजनों के लिए निश्चित रूप से दिल में ठंडक पड़नेवाली स्थिति है। लेकिन दुनिया के विशेष देश की आर्थिक राजधानी के व्‍यस्‍ततम् क्षेत्र में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर उस देश की एकता, अखण्‍डता और समत्‍व को इस तरह के छिछोरों से मिलनीवाली चुनौती से लोक नामक तंत्र के सम्‍मान को जो ठेस पहुंचती है, उसके पुनर्स्‍थापन हेतु चुनौती बनकर पेश हुए शख्‍स के बजाय चुनौतियों के आधार-स्‍तम्‍भ अर्थात् पाकिस्‍तान को कड़े सबक सिखाने की सख्‍त जरुरत है। लेकिन इस दिशा में हमारे शासकों द्वारा ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, यह बहुत दुखद है। बल्कि वे तो पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम को भारत में न्‍यौता देने को ऐसे आतुर हैं, जैसे उन्‍हें न बुलाकर क्रिकेट और भारत दोनों का अस्तित्‍व मिट जाएगा। एक तरह से इसमें सरकारों का भी दोष नहीं है। जब तक तमाशाई जनता दोनों मुल्‍कों में मौजूद है, तब तक स्‍वार्थी सरकारें व आंतकी अपने-अपने भ्रष्‍ट-निकृष्ट हित साधते रहेंगे। होने को तो ये होता कि पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम यहां आती और मैच देखने स्‍टेडियम में एक भी दर्शक नहीं जाता! चूंकि स्‍टेडियम जाकर मैच देखने की कोई बाध्‍यता नहीं है, इसलिए पाकिस्‍तान को अपने-अपने स्‍तर पर कड़ा सबक सिखाने के लिए एक-एक भारतीय को इस उपाय को आजमाना चाहिए। उनके पास देशभक्ति का इससे आसान रास्‍ता नहीं है। यदि भारतीय लोग कसाब के फांसी पर चढ़ने से सड़कों पर निकलकर खुशी मनाने में पीछे नहीं रहते हैं, तो उन्‍हें कसाब को भड़कानेवाले क्षेत्र व उसकी सरकार को भी उनके किए की सजा देने हेतु ऐसे प्रयोग करने चाहिए।
     आम जनता तो आतंकी को मृत्युदण्ड  मिलने पर झूम रही है और कहीं न कहीं कांग्रेसियों को इसके लिए धन्‍यवाद भी दे रही है, परन्‍तु सरकार की मंशा देशभक्‍त बनने की नहीं है। उन्‍हें तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनावों तथा 2014 में लोकसभा चुनाव में मतपत्रों का लालच है। नहीं तो 2008 के आंतकी आक्रमण पर जनसाधारण के पुरजोर विरोध की अनदेखी कांग्रेस ने पूरे चार साल तक क्‍यों की होती। और अब जब चुनाव समय निकट है तो वह सत्‍तासीन होने के लिए अपने सारे उपाय आजमा लेना चाहती है। 
     राष्ट्रपति पद पर आसीन प्रणव मुखर्जी जैसे वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता का कहीं न कहीं यह व्‍यक्तिगत प्रयास था कि कसाब को मौत की सजा हो। उन्‍होंने राष्ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में हिंदुह्रदय सम्राट शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से समर्थन मांगने के दौरान निश्चित रूप से इसके लिए विचार-विमर्श किया था। हो सकता है कि ठाकरे जैसे हिंदु पुरोधाओं के बारंबार कहने पर ही यह कदम उनके द्वारा उठाया गया हो। यह अच्‍छी बात है। परन्‍तु इस विषय पर कार्यवाही करने से पूर्व अपनी पार्टी के अन्‍य नेताओं से उन्‍हें यही आश्‍वासन मिला होगा कि यह आगामी चुनावों में जीत हासिल करने के लिए किया गया टोटका है, ना कि देशप्रेम में लिया गया निर्णय।
कसाब की मौत पर देशभर में झूमनेवाले लोगों और आंतकी खेल में आंतकियों से निपटने में शहीद हुए सिपाहियों व भारतीय नागरिकों की संभावनाओं पर राजनीति का यह नया दांव अपने गंदे उद्देश्‍य के साथ भारी पड़ेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि जनता चुनावों में कितनी विचारवान रहती है। लोग देशभक्ति से प्रेरित होंगे या राजभक्ति के मोहपाश में फिर फंसेंगे, यह देखना अभी बाकी है। आशा है जनता की भेड़चाल बदलेगी और ऐसा होगा तो देश की तसवीर भी बदलेगी।

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